जयपुर पोलो ग्राउंड चर्चा में क्यों है, जानें इसका 100 साल पुराना इतिहास
Sign In Advertisement X इंडियन पोलो एसोसिएशन (IPA) को अदालत से कोई राहत नहीं मिली, जिसके बाद 14 जून को केंद्र सरकार ने दिल्ली के वीआईपी रेसकोर्स इलाके में स्थ…

सौजन्य से:- AajTak
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इंडियन पोलो एसोसिएशन (IPA) को अदालत से कोई राहत नहीं मिली, जिसके बाद 14 जून को केंद्र सरकार ने दिल्ली के वीआईपी रेसकोर्स इलाके में स्थित ऐतिहासिक 'जयपुर पोलो ग्राउंड' को पूरी तरह अपने नियंत्रण में ले लिया. दरअसल, सेशंस कोर्ट ने 20 मई को जारी हुए बेदखली के आदेश पर रोक लगाने से साफ़ इनकार कर दिया था, जिसके तुरंत बाद सरकार ने इस 15 एकड़ से अधिक बड़े मैदान को अपने हाथ में ले लिया.
अदालत ने स्पष्ट किया है कि इस 15.20 एकड़ की जमीन का इस्तेमाल अब केंद्र सरकार द्वारा बड़े सार्वजनिक उद्देश्य और जनहित के लिए किया जाएगा, हालांकि कोर्ट ने इस उद्देश्य की कोई खास डिटेल अभी साझा नहीं की है.
इस ऐतिहासिक मैदान की कहानी 20वीं सदी की शुरुआत से जुड़ी है, जब पोलो को सबसे प्रतिष्ठित खेलों में से एक माना जाता था. दिल्ली में पोलो के खेल को बढ़ावा देने के लिए 1930 के दशक के आसपास जयपुर के तत्कालीन महाराजा ने यह कीमती जमीन उपहार में दी थी, जिस पर बाद में यह शानदार मैदान विकसित हुआ. साल 1933 में जयपुर पोलो टीम ने इंग्लैंड दौरे के दौरान प्रतिष्ठित 'ओपन चैंपियनशिप' समेत उन सभी बड़े टूर्नामेंटों को जीतकर एक ऐतिहासिक रिकॉर्ड बनाया था, जिनमें उन्होंने हिस्सा लिया था. इस टीम ने भारत में लगातार 9 वर्षों तक 'पोलो क्राउन' पर अपना कब्जा बनाए रखा और खेल में अपनी बादशाहत साबित की.
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आजादी के बाद का सफर और वर्ल्ड कप की ऐतिहासिक जीत
देश की आजादी के बाद इस वीआईपी प्रॉपर्टी की देखरेख का जिम्मा इंडियन पोलो एसोसिएशन (IPA) के पास आ गया और धीरे-धीरे यह मैदान भारत में पोलो खेल का मुख्य मुख्यालय बन गया. साल 1957 में महाराजा सवाई मान सिंह द्वितीय के नेतृत्व वाली भारतीय पोलो टीम ने पोलो वर्ल्ड कप जीतकर दुनिया भर में भारत का नाम रोशन किया था. महाराजा सवाई मान सिंह द्वितीय ने जयपुर में भी एक अत्याधुनिक पोलो ग्राउंड बनवाया था, जहां यह टीम अपनी कड़ा अभ्यास और ट्रेनिंग करती थी.
हर साल अगस्त में बेंगलुरु पोलो ग्राउंड से शुरू होने वाले पोलो सीजन के मैच अक्टूबर से दिल्ली के इसी मैदान पर खेले जाते थे, जिन्हें देखने के लिए हर बार 300 से 400 दर्शक पहुंचते थे. इस मैदान पर आखिरी पोलो मैच इसी साल 29 मार्च को 'जिंदल पैंथर्स' और 'जयपुर अचीवर्स' के बीच खेला गया था.
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सरकार और इंडियन पोलो एसोसिएशन के बीच विवाद की मुख्य वजह
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इस मैदान को लेकर केंद्र सरकार और इंडियन पोलो एसोसिएशन के बीच कानूनी लड़ाई लंबे समय से चल रही थी. एक तरफ जहां केंद्र सरकार का दावा है कि 'पब्लिक प्रेमाइसेस एक्ट' के तहत इंडियन पोलो एसोसिएशन (IPA) का इस बेशकीमती जमीन पर कब्ज़ा पूरी तरह से अनधिकृत और गैर-कानूनी था. वहीं दूसरी तरफ, इंडियन पोलो एसोसिएशन का तर्क है कि इस मैदान पर उनका मालिकाना हक और नियंत्रण ऐतिहासिक रूप से पूरी तरह वैध है और वे दशकों से लगातार यहां इस खेल के संरक्षण का काम कर रहे हैं.
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