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World Bamboo Day: हाथों में हुनर, बांस से रोजगार, उदयपुर के कारीगरों की मेहनत की कहानी

World Bamboo Day: हाथों में हुनर, बांस से रोजगार, उदयपुर के कारीगरों की मेहनत की कहानी असम से राजस्थान आने पर बांस की कीमत प्रति नग 300 रुपए के आसपास पड़ती है. उदयपुर से कपिल पारीक की रिपोर्ट... Published : September 18,…

ETV Bharat के अनुसार18 सितंबर 2026 को 05:04 am बजे
World Bamboo Day: हाथों में हुनर, बांस से रोजगार, उदयपुर के कारीगरों की मेहनत की कहानी

सौजन्य से:- ETV Bharat

World Bamboo Day: हाथों में हुनर, बांस से रोजगार, उदयपुर के कारीगरों की मेहनत की कहानी

असम से राजस्थान आने पर बांस की कीमत प्रति नग 300 रुपए के आसपास पड़ती है. उदयपुर से कपिल पारीक की रिपोर्ट...

Published : September 18, 2026 at 9:59 AM IST

उदयपुर: बांस की पतली पट्टियां, हाथों की सफाई और घंटों की मेहनत, इनसे तैयार होते हैं टोकरी, सूप, डलिया और रोजमर्रा के काम आने वाले कई सामान. उदयपुर शहर में बांस का काम करने वाले परिवारों के लिए यह सिर्फ एक पारंपरिक कला नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आजीविका का माध्यम है. विश्व बांस दिवस के अवसर पर ईटीवी भारत उन कारीगरों के बीच पहुंचा, जो बांस को आकार देकर अपने परिवार का पेट पाल रहे हैं. इन कारीगरों की कहानी हुनर, परंपरा और बाजार में अपनी पहचान बनाने की जद्दोजहद को सामने लाती है.

10 साल की उम्र में सीखा हुनर, अब चौथी पीढ़ी कर रही काम: उदयपुर शहर में बांस का काम करने वाली पुष्पा बाई ने बताया कि जब वह 10 साल की थीं, तब उनके माता-पिता ने उन्हें यह काम सिखाया था. उस समय से लेकर आज तक वह इसी पारंपरिक कला से जुड़ी हुई हैं. पुष्पा के अनुसार, अब उनके परिवार की चौथी पीढ़ी भी इस काम में जुटी हुई है. बांस से अलग-अलग आकार के बर्तन और घरेलू उपयोग का सामान तैयार किया जाता है. उनके बनाए उत्पाद राजस्थान के अलग-अलग इलाकों तक पहुंचते हैं. पुष्पा ने बताया कि श्रीनाथजी मंदिर सहित भीलवाड़ा, जयपुर, अजमेर, कोटा और बांसवाड़ा तक उनके बनाए सामान जाते हैं. इस काम के लिए बांस असम से आता है. पुष्पा ने बताया कि उदयपुर में करीब 70 से 80 परिवार इस काम में जुटे हुए हैं. कई परिवारों की पांच से सात पीढ़ियां भी इस पारंपरिक काम से जुड़ी रही हैं. ऐसे में बांस शिल्प उनके लिए केवल रोजगार नहीं, बल्कि परिवार की पहचान और विरासत का हिस्सा है.

बांस की एक डंडी से तैयार होता है उपयोगी सामान: बांस का काम करने वाली एक अन्य महिला सरोज ने बताया कि कारीगर बांस की डंडियों से पतली पट्टियां तैयार करते हैं. इसके बाद इन्हीं पट्टियों को हाथों से बुनकर अलग-अलग आकार और डिजाइन के सामान बनाए जाते हैं. बांस से टोकरी, सूप, डलिया और कई तरह के घरेलू उपयोग के सामान तैयार किए जाते हैं. इन उत्पादों का आकार और डिजाइन उनके इस्तेमाल के अनुसार अलग-अलग होता है. बांस की पट्टियों को सही तरीके से आकार देना और उन्हें आपस में बुनना इस काम का अहम हिस्सा है. यह काम देखने में जितना सहज लगता है, इसे तैयार करने में उतनी ही मेहनत और हाथों की सफाई की जरूरत होती है. कारीगरों के लिए बांस को उपयोगी सामान में बदलना रोजमर्रा के काम का हिस्सा है, जिसे वे लंबे समय से करते आ रहे हैं.

'परंपरा चली आ रही, लेकिन मुनाफा कम': बांस का काम करने वाली एक अन्य महिला मंजू ने बताया कि उनके परिवार में यह काम परंपरा के अनुसार आगे बढ़ा है. उन्होंने कहा कि पहले उनके बाप-दादा यह काम करते थे और अब वे खुद इसे कर रही हैं. आने वाली पीढ़ी के बेटा-बेटी भी इसी काम से जुड़े हुए हैं. मंजू के अनुसार, यह लगातार चलती आ रही परंपरा है. हालांकि, उन्होंने यह भी बताया कि इस काम में जितनी लागत लगती है, उतना मुनाफा नहीं हो पाता. इसके बावजूद परिवार इस कला से जुड़ा हुआ है और इसे आगे बढ़ा रहा है.

क्या अगली पीढ़ी संभालेगी बांस शिल्प की विरासत?: पुष्पा और मंजू के परिवारों की कहानी बताती है कि बांस से जुड़ा यह हुनर पीढ़ियों से आगे बढ़ रहा है. किसी ने बचपन में माता-पिता से काम सीखा, तो किसी के परिवार में बाप-दादा के बाद अगली पीढ़ी इसे आगे बढ़ा रही है. बांस से एक वस्तु तैयार करने में कारीगर को करीब एक से दो दिन का समय लगता है. इसमें सबसे पहले बांस का चयन कर उसे काटना, छीलना और पतली पट्टियों में तैयार करना शामिल है. इसके बाद इन पट्टियों को आकार देकर मेहनत और बारीकी से उत्पाद तैयार किया जाता है. वक्त के साथ बाजार में महंगाई बढ़ी, लेकिन कारीगरों की मेहनत और हुनर के मुताबिक उनके उत्पादों के दाम नहीं बढ़े.

बांस से बनते छोटे-छोटे आइटम, लागत: पुष्पा ने बताया कि बांस से बनने वाले उत्पादों में पेन स्टैंड, छोटी टोकरी, कोस्टर, चाबी रखने का स्टैंड, फूलदान और ट्रे जैसे उत्पाद शामिल हैं. कारीगरों के अनुसार, बांस से पेन स्टैंड बनाने में करीब 70 से 40 रुपए तक की लागत आती है, जबकि इससे 100-150 रुपए तक में बेचा जा सकता है. इसी तरह छोटी टोकरी तैयार करने में 100 से 80 रुपए और फूलदान बनाने में 40 से 100-200 रुपए तक खर्च आता है. उत्पाद की बिक्री कीमत उसकी डिजाइन, आकार और कारीगरी के आधार पर तय होती है. बांस की छोटी ट्रे, मोबाइल स्टैंड, अगरबत्ती स्टैंड, चटाई, डलिया और सजावटी लैंप भी बनाए जाते हैं. इसमें अलग-अलग सामान की अलग-अलग रीट है. अगर कोई बड़ी संख्या में मंगवाता है, तो उसकी अलग रीट होती है. खुदरा बाजार की अलग रेट है.

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बांस के सामान पर फैंसी आइटम का असर: कारीगर चंदा ने बताया कि वर्तमान दौर में बाजार में प्लास्टिक, धातु और अन्य आधुनिक सजावटी सामान की उपलब्धता बढ़ने के बावजूद बांस से बने पारंपरिक उत्पादों की उपयोगिता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है. बांस की टोकरी, डलिया, चटाई और घरेलू उपयोग के सामान आज भी ग्रामीण जीवन, स्थानीय बाजार और हस्तशिल्प से जुड़े हैं. बदलते दौर में बांस के सामान की मांग बनाए रखने के लिए कारीगर पारंपरिक हुनर के साथ आधुनिक डिजाइन और उपयोगिता वाले उत्पाद तैयार कर रहे हैं.

असम से बांस आने की लागत और कारण: कारीगर पुष्पेंद्र ने बताया कि असम से राजस्थान तक बांस मंगाने की लागत मुख्य रूप से दूरी, परिवहन के साधन, बांस की गुणवत्ता, मात्रा और स्थानीय बाजार भाव पर निर्भर करती है. असम बांस की उपलब्धता वाला प्रमुख राज्य है. इसलिए वहां से कच्चा बांस दूसरे राज्यों में भेजा जाता है. असम से राजस्थान आने पर बांस की कीमत प्रति नग 300 रुपए के आसपास पड़ती है. पीढ़ीयों से यहां पर माल मंगवाया जा रहा है.

राजस्थान में बांस व्यवसाय को बढ़ावा देने की पहल: राजस्थान में बांस से जुड़े व्यवसाय को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार के राष्ट्रीय बांस मिशन के तहत बांस की खेती, नर्सरी विकास, कारीगरों के प्रशिक्षण और उत्पादों के बाजार विस्तार पर जोर दिया जा रहा है. राजस्थान सरकार के बजट प्रावधान के तहत बांस उत्पाद बनाने वाले कारीगरों और छोटे उद्यमियों को व्यवसाय विस्तार के अवसर मिल सकते हैं. उदयपुर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, सिरोही, चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़, सवाई माधोपुर, करौली, बारां, झालावाड़, भीलवाड़ा और राजसमंद आदि जिलों में बांस के पौधारोपण को प्राथमिकता दी जा रही है. कृषि विज्ञान केंद्रों (KVKs) और उद्यान विभाग के जरिए किसानों को आधुनिक तकनीक, पौध उत्पादन और बाजार से जुड़ने का प्रशिक्षण दिया जाता है. राज्य में गुणवत्तापूर्ण पौधों की उपलब्धता के लिए नई नर्सरियों के गठन पर जोर दिया जा रहा है.

सरकार की ओर से दिया जाएगा अनुदान: राष्ट्रीय बांस मिशन के तहत किसानों को बांस की खेती के लिए 50 प्रतिशत अनुदान दिया जाएगा. योजना का उद्देश्य बांस उत्पादन को बढ़ावा देने के साथ किसानों की आय में वृद्धि करना है. उदयपुर जिले में इस योजना के तहत 25 हेक्टेयर भूमि पर बांस रोपण का लक्ष्य निर्धारित किया गया है. उद्यान विभाग के उप निदेशक डॉ हीरासिंह राठौड़ ने बताया कि प्रति हेक्टेयर बांस की खेती की निर्धारित लागत 1 लाख 20 हजार रुपए है, जिस पर किसान को 60 हजार रुपए का अनुदान दिया जाएगा. योजना के तहत एक हेक्टेयर भूमि में 400 बांस के पौधे लगाने होंगे तथा पौधों के बीच 5X5 मीटर की दूरी रखनी होगी. न्यूनतम 0.20 हेक्टेयर भूमि में बांस का रोपण करने पर भी अनुदान देय होगा. जिले के सायरा क्षेत्र में किसानों ने बांस के पौधे लगाना शुरू कर दिया है. बांस को अधिक ऑक्सीजन देने वाला और भूमि कटाव रोकने में सहायक पौधा बताया गया है. इससे फर्नीचर, खिलौने, बर्तन और सजावटी सामान सहित कई उत्पाद बनाए जा सकते हैं. राजस्थान में राष्ट्रीय बांस मिशन के तहत उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, सिरोही, राजसमंद, पाली, चित्तौड़गढ़, सलूंबर, कोटा, बारां, झालावाड़ और प्रतापगढ़ जिले शामिल हैं.

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इन जिलों में बांस की नर्सरी, पौधे लगाने, बांस की खेती, सामान बनाने के लिए जरूरी सुविधाएं और कारीगरों की ट्रेनिंग पर काम किया जाएगा. साल 2026-27 के लिए इसके तहत वन विभाग की ओर से करीब 3.03 करोड़ रुपये की योजना बनाई गई है. इसका मकसद सिर्फ खेत में बांस उगाना नहीं है. कोशिश यह है कि बांस खेत से निकलकर सीधे कारीगर और फिर बाजार तक पहुंचे.

उदयपुर क्यों है खास?: उदयपुर में बांस से जुड़े काम की पुरानी परंपरा है. जिले के ओगणा, कोटड़ा और देवला इलाके में बांस पाया जाता है. उदयपुर में बांस का कारोबार और उसकी बिक्री का नेटवर्क भी पहले से मौजूद है. यही वजह है कि बांस मिशन में उदयपुर की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है. अगर स्थानीय स्तर पर पर्याप्त मात्रा में बांस उपलब्ध होता है, तो कारीगरों को दूर के राज्यों से कच्चा माल मंगाने की जरूरत कम हो सकती है. इसका सीधा असर उनकी लागत पर पड़ सकता है.

किसानों के लिए भी नया बाजार: बांस मिशन का एक बड़ा फायदा किसानों को हो सकता है. दक्षिण राजस्थान के आदिवासी बहुल इलाकों में अगर बांस की खेती बढ़ती है, तो किसानों के लिए यह अतिरिक्त आमदनी का साधन बन सकता है. इसके लिए सिर्फ पौधे लगाना काफी नहीं होगा. किसानों को यह भी पता होना जरूरी है कि कौन सी किस्म बाजार में मांग वाली है, बांस कब काटना है और उसे कहां बेचना है. अगर किसान से बांस सीधे स्थानीय कारीगर या प्रोसेसिंग यूनिट तक पहुंचता है, तो बीच के कई खर्च कम हो सकते हैं.

उदयपुर के लिए पर्यटन भी बड़ा बाजार: उदयपुर देश-दुनिया के पर्यटकों के बीच जाना-पहचाना शहर है. ऐसे में यहां बने बांस के सामान को स्थानीय पहचान के साथ बाजार में पेश किया जा सकता है. पर्यटक अक्सर ऐसी चीजें खरीदना पसंद करते हैं, जो उन्हें किसी जगह की कला और संस्कृति से जोड़ती हैं. अगर बांस के प्रोडक्ट को उदयपुर की लोक कला और स्थानीय डिजाइन के साथ तैयार किया जाए तो यह सिर्फ घरेलू सामान नहीं, बल्कि राजस्थान की पहचान से जुड़ा उत्पाद भी बन सकता है.

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