250 बरस पहले अजमेर किले से मंदिर में विराजे श्रीलक्ष्मी नारायण और राधा कृष्ण, अविवाहितों को मिलता है विवाह का आशीर्वाद
250 बरस पहले अजमेर किले से मंदिर में विराजे श्रीलक्ष्मी नारायण और राधा कृष्ण, अविवाहितों को मिलता है विवाह का आशीर्वाद कृष्ण जन्माष्टमी पर जानिए अजमेर के अनोखे मंदिर के बारे में जहां लक्ष्मी नारायण के साथ राधा-कृष्ण विरा…

सौजन्य से:- ETV Bharat
250 बरस पहले अजमेर किले से मंदिर में विराजे श्रीलक्ष्मी नारायण और राधा कृष्ण, अविवाहितों को मिलता है विवाह का आशीर्वाद
कृष्ण जन्माष्टमी पर जानिए अजमेर के अनोखे मंदिर के बारे में जहां लक्ष्मी नारायण के साथ राधा-कृष्ण विराजमान हैं. प्रियांक शर्मा की रिपोर्ट...
Published : September 3, 2026 at 2:18 PM IST
अजमेर : अजमेर में अंग्रेजी हुकूमत से पहले मराठाओं का शासन था. मराठाओं के समय अजमेर में अनेक मंदिर हैं. इनमें करीब 250 बरस पट्टी कटला स्थित प्राचीन श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर भी है. शहर के बीच होने के साथ ही यह जन आस्था का बड़ा केंद्र भी है. यहां गुरुवार को ब्याह की निशानी गठजोड़ या दूल्हे के साफे पर लगने वाली कलंगी भेंट करने पर अविवाहित युवक युवतियों को विवाह का आशीर्वाद मिलता है. यहां गृहस्थ परिवार में सुख शांति और समृद्धि के लिए गुरुवार को चने की दाल भी भेंट करते हैं. यूं तो वर्ष में मंदिर में अनेक उत्सव होते हैं, लेकिन जन्माष्टमी का महोत्सव विशेष और भव्य रहता है.
श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर में लक्ष्मी और नारायण की दिव्य संगमरमर की प्रतिमा है. वहीं, युगल सरकार राधा-कृष्ण की भी समकालीन ही प्रतिमाएं विराजमान हैं. मंदिर के महंत श्याम शरण बताते हैं कि 250 बरस पहले भगवान लक्ष्मी नारायण और राधा कृष्ण की यह प्रतिमाएं अजमेर के किले में थी. किले की दूसरी मंजिल पर मराठाओं ने मंदिर बनाकर इन्हें स्थापित किया था. किले में मराठा रहते थे और वहां भगवान लक्ष्मी नारायण भगवान की पूजा अर्चना नित्य हुआ करती थी.
इसे भी पढे़ं. Special: कनक वृंदावन में बसा राधा माधव मंदिर, जानिए कैसे वृंदावन से अरावली की वादियों तक पहुंचा यह ऐतिहासिक विग्रह
दौलत राम सिंधिया ने महंत सेवा राम को सौंपी थी जिम्मेदारी : उन्होंने बताया कि दौलत राम सिंधिया ने यह अद्भुत और दिव्य प्रतिमा स्थापित की थी. अजमेर में 60 वर्ष तक शासन करने के बाद अग्रेजों के अजमेर आने के बाद मराठा वापस लौटने लगे. तब अंग्रेजों ने किले को शस्त्रागार बना दिया, जिसे मैग्जीन कहा जाने लगा. इसके बाद अंग्रेजों ने किले से प्रतिमाओं को हटाने के लिए कहा. तब दौलतराम सिंधिया ने मौजूदा मंदिर के स्थान को खरीदा और यहां मंदिर का निर्माण करवाया. इसके बाद प्रतिमाओं को स्थापित करके महंत सेवादास को जिम्मा सौंप दिया और वापस चले गए. भगवान लक्ष्मी नारायण और युगल सरकार राधा कृष्ण को पट्टी कटला क्षेत्र में मंदिर का निर्माण करवा कर यहां स्थापित किया गया. अजमेर का किला वर्तमान में राजकीय संग्रहालय में तब्दील हो गया है.
बालक बन पहुंच गए भगवान लक्ष्मी नारायण : उन्होंने बताया कि महंत लक्ष्मण दास के बाद सलेमाबाद निंबार्क पीठ से ही मंदिर के प्रबंधन की व्यवस्था शुरू हुई. निंबार्क संप्रदाय की उपासना राधा कृष्ण की है. श्री राधा कृष्ण भी भगवान लक्ष्मी नारायण के ही अवतार हैं. भक्त और भगवान के बीच प्रेम का एक किस्सा सुनाते हुए महंत श्याम शरण ने बताया कि मंदिर के बाहर मंदिर परिसर में ही हलवाई की दुकान है. यहां वर्षों पहले सीताराम हलवाई दुकान में पेड़े बनाने के बाद भगवान लक्ष्मी नारायण और राधा कृष्ण को नित्य भोग लगाया करते थे. एक दिन हलवाई सीताराम भगवान को भोग लगाना भूल गए. उस दिन ही हलवाई सीताराम की दुकान पर एक नन्हा बालक आया और उसने कहा कि उसे भूख लगी है उसे खाने के लिए पेड़ा दें.
इसे भी पढे़ं. राजस्थान में है 290 साल पुराना विश्वकर्मा मंदिर, जहां भगवान के साथ गणेश और लक्ष्मी-नारायण हैं विराजमान
एक पैर में पायल नहीं थी : हलवाई सीताराम ने बालक को खाने के लिए पेड़े दे दिए और पैसे मांगने पर बालक ने अपनी एक पांव की पायल उतार कर उन्हें गिरवी रख दी. सुबह जब पुजारी ने प्रतिमा को देखा तो भगवान लक्ष्मी नारायण के एक पैर में पायल नहीं थी. हलवाई सीताराम ने पायल वापस लौटाई या नहीं यह नहीं पता, लेकिन आज भी भगवान लक्ष्मी नारायण के दोनों पैरों में एक ही पायल है. भगवान लक्ष्मी नारायण यहां आने वाले सभी भक्तों के मनोरथ पूर्ण करते हैं. उन्होंने बताया कि जन्माष्टमी पर विशेष कार्यक्रम होता है. रात को भगवान लक्ष्मी नारायण और युगल सरकार राधा कृष्ण की प्रतिमा का दूध और पंचामृत से अभिषेक होता है. इसके बाद भगवान का शृंगार करके रात्रि को कृष्ण जन्म के समय पर महा आरती होती है. भगवान को झूले में भी झुलाया जाता है. साथ ही भक्तों को विशेष पंजीरी का प्रसाद वितरित किया जाता है.
श्रद्धालुओ की हर मनोकामना होती है पूर्ण : मंदिर के पुजारी आचार्य अंकित पारीक ने बताया कि भगवान लक्ष्मी नारायण की दिव्य और चमत्कारिक मूर्ति है. जिन लोगों का विवाह नहीं हो पा रहा है, वह पंडितों के बताए उपाए यहां करते हैं. मान्यता है कि उन्हें भगवान श्री लक्ष्मी नारायण का आशीर्वाद प्राप्त होता है. शादी और अन्य मनोरथ सिद्धि के लिए गुरुवार के दिन भक्त यहां चने की दाल, दूल्हे के सेफ पर लगने वाली कलंगी, गठजोड़ आदि सामग्री भगवान को भेंट करते हैं. भगवान सभी की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं. जन्माष्टमी पर धूमधाम से उत्सव मनाया जाता है. बड़ी संख्या में यहां रात को भगवान के बाल स्वरूप के दर्शनों के लिए श्रद्धालु आते हैं.
इसे भी पढे़ं. जन्माष्टमी विशेषः इस मंदिर में दोपहर 12 बजे होता है ठाकुर जी का जन्मोत्सव, औरंगजेब से बचाते हुए जयपुर लाया गया था विग्रह
श्रद्धालु शशिकला 30 वर्षों से मंदिर में दर्शनों के लिए नित्य आ रही हैं. उन्होंने बताया कि श्री लक्ष्मी नारायण भगवान का यह काफी प्राचीन मंदिर है. मंदिर में वर्ष में कई उत्सव मनाए जाते हैं. इनमें झूला उत्सव, छठ उत्सव और श्री कृष्ण जन्माष्टमी का उत्सव भी धूमधाम से मनाया जाता है. जन्माष्टमी पर भगवान लक्ष्मी नारायण के बाल स्वरूप के दर्शन करने और उन्हें झूला झूलाने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर आते हैं. भगवान श्री लक्ष्मी नारायण की प्रतिमा में आस्था बसती है. भगवान श्री लक्ष्मी नारायण ने हर मनोकामनाएं पूर्ण की हैं और गृहस्थ के सभी सुख प्रदान किए हैं.
Powered by Reporting Rajasthan Files
संबंधित ख़बरें

एल.गोपाल ज्वेलर्स; जयपुर शोरूम ‘इंडियाज कूलेस्ट स्टोर अवार्ड-2026’ से सम्मानित - Jaipur News

राजस्थान: त्योहारों में यात्रियों को बड़ी राहत, खजुराहो-उदयपुर और जोधपुर-मऊ के बीच दौड़ेंगी स्पेशल ट्रेनें

Rajasthan Gets Its Longest High-Level Bridge Over Banas River


