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राजस्थान में ट्रैक्टर से कुचलकर मार डाले गए थे दलित; अदालत ने 40 आरोपियों को कर दिया बरी

राजस्थान में ट्रैक्टर से कुचलकर मार डाले गए थे दलित; अदालत ने 40 आरोपियों को कर दिया बरी मामला 14 मई 2015 को नागौर जिले के डांगावास गांव में हुए खूनी संघर्ष से जुड़ा है। उस दिन जमीन विवाद को लेकर हुई हिंसा में छह लोगों क…

Hindustan के अनुसार6 अगस्त 2026 को 06:15 am बजे
राजस्थान में ट्रैक्टर से कुचलकर मार डाले गए थे दलित; अदालत ने 40 आरोपियों को कर दिया बरी

सौजन्य से:- Hindustan

राजस्थान में ट्रैक्टर से कुचलकर मार डाले गए थे दलित; अदालत ने 40 आरोपियों को कर दिया बरी

मामला 14 मई 2015 को नागौर जिले के डांगावास गांव में हुए खूनी संघर्ष से जुड़ा है। उस दिन जमीन विवाद को लेकर हुई हिंसा में छह लोगों की मौत हुई थी, जिनमें पांच दलित थे। आरोप था कि तीन लोगों को ट्रैक्टर से कुचलकर बेरहमी से मार दिया गया था।

राजस्थान के नागौर जिले के बहुचर्चित डांगावास दलित हत्याकांड में 11 साल बाद बड़ा फैसला आया है। मेड़ता स्थित विशेष अनुसूचित जाति-जनजाति (SC-ST) कोर्ट ने बुधवार को मामले में सभी 40 आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ ठोस और विश्वसनीय सबूत पेश करने में असफल रहा, इसलिए संदेह का लाभ देते हुए सभी आरोपियों को दोषमुक्त किया जाता है।

यह मामला 14 मई 2015 को नागौर जिले के डांगावास गांव में हुए खूनी संघर्ष से जुड़ा है। उस दिन जमीन विवाद को लेकर हुई हिंसा में छह लोगों की मौत हुई थी, जिनमें पांच दलित थे। आरोप था कि तीन लोगों को ट्रैक्टर से कुचलकर बेरहमी से मार दिया गया था। इस घटना ने पूरे राजस्थान को झकझोर दिया था और दलित संगठनों के बड़े आंदोलन के बाद मामले की जांच CBI को सौंप दी गई थी।

23 बीघा जमीन के विवाद से भड़की थी हिंसा

जांच एजेंसियों के मुताबिक, विवाद डांगावास गांव की 23 बीघा जमीन को लेकर था। आरोप था कि कुछ लोगों ने दलित परिवारों को जमीन से बेदखल करने के लिए उन पर हमला किया। घटना के दौरान गोलीबारी, लाठी-डंडे और कुल्हाड़ियों का इस्तेमाल हुआ। कई वाहनों में आग लगा दी गई और पूरे गांव में तनाव फैल गया।

घटना के बाद राज्यभर में विरोध प्रदर्शन हुए। दलित संगठनों और सामाजिक संस्थाओं ने दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच CBI को सौंप दी गई थी।

82 गवाह पेश हुए, लेकिन आरोपी नहीं पहचान सके

सुनवाई के दौरान CBI की ओर से 82 गवाह पेश किए गए, जबकि परिवादी पक्ष ने 8 अतिरिक्त गवाह अदालत में प्रस्तुत किए। हालांकि अदालत ने पाया कि अधिकांश गवाह आरोपियों की पहचान नहीं कर सके और अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं दे पाया।

अदालत ने माना कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किसी भी आरोपी के खिलाफ अपराध सिद्ध नहीं होता। इसी आधार पर सभी 40 आरोपियों को बरी कर दिया गया।

बचाव पक्ष बोला- CBI ने गलत लोगों को बनाया आरोपी

आरोपियों की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता महेंद्र चौधरी ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि CBI ने शुरुआत से ही गलत दिशा में जांच की। उनका दावा था कि एजेंसी ने घटना की मूल वजह को नजरअंदाज किया।

उन्होंने कहा कि गांव के घीसाराम ने बिना नामांतरण कराए जमीन चिमनाराम को बेच दी थी, जिससे विवाद पैदा हुआ। इसी विवाद ने बाद में हिंसक रूप ले लिया। उनके मुताबिक CBI ने वास्तविक तथ्यों की अनदेखी करते हुए 40 ऐसे लोगों को आरोपी बना दिया, जिनका घटना से कोई संबंध नहीं था। गलत जांच के कारण ही अदालत ने सभी को बरी कर दिया।

अभियोजन पक्ष हाईकोर्ट जाएगा

सरकारी पक्ष के अधिवक्ता महिपाल लोट्टियां ने कहा कि अदालत के विस्तृत फैसले का अध्ययन किया जाएगा। इसके बाद कानूनी विशेषज्ञों से सलाह लेकर राजस्थान हाईकोर्ट में अपील दायर की जाएगी।

उन्होंने कहा कि अदालत का विस्तृत आदेश मिलने के बाद आगे की कानूनी रणनीति तय की जाएगी।

पीड़ित परिवारों का सवाल- फिर हमारे अपने लोगों को किसने मारा?

फैसले के बाद पीड़ित परिवारों में गहरा आक्रोश और निराशा देखने को मिली। परिजनों ने सवाल उठाया कि यदि सभी आरोपी बरी हो गए तो आखिर छह लोगों की हत्या किसने की?

पीड़ित परिवारों का कहना है कि उन्हें अब भी न्याय मिलने का इंतजार है। उनका मानना है कि इतने बड़े हत्याकांड में किसी का दोषी न ठहराया जाना न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

फैसले के समय कोर्ट के बाहर भारी भीड़

बुधवार को फैसला सुनाए जाने से पहले मerta कोर्ट परिसर के बाहर बड़ी संख्या में लोग जुटे थे। फैसले को लेकर पूरे इलाके में उत्सुकता बनी हुई थी। जैसे ही अदालत ने सभी आरोपियों को बरी करने का फैसला सुनाया, कोर्ट परिसर के बाहर मौजूद समर्थकों ने खुशी जताई और नारे लगाए।

11 साल बाद आया फैसला, लेकिन कई सवाल बाकी

डांगावास हत्याकांड राजस्थान के सबसे चर्चित दलित हिंसा मामलों में गिना जाता है। इस मामले में वर्षों तक जांच, गिरफ्तारी, चार्जशीट और सुनवाई का लंबा दौर चला। हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद आरोपियों ने सरेंडर किया और मुकदमे की सुनवाई आगे बढ़ी।

अब विशेष अदालत के फैसले ने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया है। एक तरफ सभी आरोपी बरी हो चुके हैं, तो दूसरी तरफ पीड़ित परिवार न्याय की मांग पर कायम हैं। अभियोजन पक्ष के हाईकोर्ट जाने के संकेतों के बीच यह मामला अभी पूरी तरह खत्म नहीं माना जा रहा है। आने वाले दिनों में राजस्थान हाईकोर्ट में इस फैसले को चुनौती दिए जाने के बाद इस बहुचर्चित हत्याकांड की कानूनी लड़ाई एक बार फिर तेज हो सकती है।

लेखक के बारे में

Sachin Sharmaसचिन शर्मा | वरिष्ठ पत्रकार (राजस्थान)

सचिन शर्मा राजस्थान के एक अनुभवी और वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 6 वर्षों से अधिक का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त है। वर्तमान में वह भारत के अग्रणी समाचार संस्थान ‘लाइव हिन्दुस्तान’ (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में राजस्थान सेक्शन का नेतृत्व कर रहे हैं। ग्राउंड रिपोर्टिंग से लेकर डिजिटल जर्नलिज्म तक, सचिन ने समाचारों की सटीकता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता को हमेशा प्राथमिकता दी है।

सचिन शर्मा का पत्रकारिता करियर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से शुरू हुआ, जहां उन्होंने जी राजस्थान में लगभग 3 वर्षों तक मेडिकल और एजुकेशन बीट पर रिपोर्टर के रूप में काम किया। इस दौरान उन्होंने स्वास्थ्य व्यवस्था, शिक्षा नीतियों और जनहित से जुड़े मुद्दों पर गहन और तथ्यपरक रिपोर्टिंग की। इसके बाद प्रिंट और डिजिटल मीडिया में सक्रिय रहते हुए उन्होंने राजनीति, प्रशासन, सामाजिक सरोकार और जन आंदोलन जैसे विषयों पर भी व्यापक कवरेज किया।

शैक्षणिक रूप से, सचिन शर्मा ने राजस्थान विश्वविद्यालय से बी.कॉम किया है, जिससे उन्हें फाइनेंस और आर्थिक मामलों की मजबूत समझ मिली। इसके बाद उन्होंने मास कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन कर पत्रकारिता की सैद्धांतिक और व्यावहारिक दक्षता हासिल की। सचिन शर्मा तथ्य-आधारित रिपोर्टिंग, स्रोतों की विश्वसनीयता और पाठकों के विश्वास को पत्रकारिता की सबसे बड़ी पूंजी मानते हैं।

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