दो फैसले: हाईकोर्ट की सख्ती के बाद रेट में दो सदस्य नियुक्त, सरकार ने अध्यक्ष नियुक्ति के लिए मांगा समय...पूर्व राज्यपाल कमला से जुड़े भूमि विवाद में निचली अदालत का आदेश रद्द
दो फैसले: हाईकोर्ट की सख्ती के बाद रेट में दो सदस्य नियुक्त, सरकार ने अध्यक्ष नियुक्ति के लिए मांगा समय...पूर्व राज्यपाल कमला से जुड़े भूमि विवाद में निचली अदालत का आदेश रद्द सरकार ने रेट के दो सदस्यों की नियुक्ति के आदे…

सौजन्य से:- ETV Bharat
दो फैसले: हाईकोर्ट की सख्ती के बाद रेट में दो सदस्य नियुक्त, सरकार ने अध्यक्ष नियुक्ति के लिए मांगा समय...पूर्व राज्यपाल कमला से जुड़े भूमि विवाद में निचली अदालत का आदेश रद्द
सरकार ने रेट के दो सदस्यों की नियुक्ति के आदेश हाईकोर्ट में किए पेश. सुनवाई 15 सितंबर तक टाली.
Published : August 11, 2026 at 7:25 PM IST
जयपुर: राजस्थान हाईकोर्ट की दखल के बाद आखिर राज्य सरकार ने सिविल सेवा अपीलीय अधिकरण (रेट) में दो सदस्य नियुक्त कर दिए. राज्य सरकार ने मंगलवार को दोनों सदस्यों के नियुक्ति आदेश हाईकोर्ट में पेश किए एवं अध्यक्ष पद पर नियुक्ति के लिए समय मांगा. अदालत ने सुनवाई 15 सितंबर तक टाल दी. कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस चन्द्रशेखर शर्मा की खंडपीठ ने यह आदेश अधिवक्ता दिलीप कुरका व अन्य की याचिका पर दिए. उधर, अन्य मामले में पूर्व राज्यपाल कमला बेनीवाल से जुड़े भूमि विवाद में निचली अदालत का आदेश रद्द कर दिया.
सिविल सेवा अपीलीय अधिकरण से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने बताया कि पूर्व आईएएस अंतर सिंह नेहरा और रिटायर आईएएस वीरेन्द्र सिंह बांकावत को अधिकरण में बतौर सदस्य जयपुर पीठ में तीन साल के लिए नियुक्ति दी गई है. अधिकरण के अध्यक्ष के पद पर भी नियुक्ति प्रकियाधीन चल रही है. ऐसे में समय दिया जाए. इस पर अदालत ने सुनवाई 15 सितंबर तक टाल दी.
पढ़ें: हाईकोर्ट का आदेश: एक सप्ताह अधिकरण में करें नियुक्तियां वरना कार्मिक सचिव हों पेश
पिछली सुनवाई में जताई थी नाराजगी: अदालत ने 4 अगस्त को रेट के खाली पदों पर नियुक्ति नहीं करने पर कड़ी नाराजगी जताई थी.अदालत ने एक सप्ताह में खाली पदों पर नियुक्ति नहीं करने पर कार्मिक सचिव को हाजिर होने के निर्देश दिए थे. जनहित याचिका में कहा गया कि सरकारी कर्मचारियों के सेवा संबंधी विवादों की सुनवाई के लिए अधिकरण का गठन किया गया है. बीते करीब चार माह से अध्यक्ष का पद खाली है. वहीं, एक न्यायिक अधिकारी ही प्रभावी रूप से कार्यरत है. उनके अनुपलब्धता पर अधिकरण काम नहीं करता. इसके चलते अधिकरण में 1300 से अधिक अपीलों पर प्रभावी सुनवाई नहीं हो पा रही है.
कमला से जुड़े मामले में निचली कोर्ट का आदेश रद्द: इस बीच, हाईकोर्ट ने भूमि के स्वामित्व से संबंधित फर्जी दस्तावेज बनाकर मुआवजे में भूमि लेने के आरोपों को लेकर पूर्व राज्यपाल कमला बेनीवाल एवं अन्य से जुड़े चर्चित मामले में एसीजेएम क्रम 7 के 15 जुलाई 2019 को लिए प्रसंज्ञान और उसके खिलाफ अपील निरस्त करने वाले एडीजे कोर्ट के 15 अक्टूबर 2019 का आदेश रद्द कर दिया. जस्टिस गणेश राम मीना की खंडपीठ ने यह आदेश कमला बेनीवाल व अन्य की ओर से दायर दो आपराधिक याचिकाओं का निस्तारण करते हुए दिए.
जस्टिस गणेशराम मीना की खंडपीठ ने आदेश में कहा, विवाद याचिकाकर्ताओं को खातेदारी अधिकार दिए जाने के संबंध में है. यह विभिन्न अदालतों में लंबित है. जो खातेदारी अधिकार दिए गए थे, उन्हें अभी तक समाप्त नहीं किया गया है. निचली अदालत ने इस अहम तथ्य की अनदेखी की है. इसके अलावा निचली अदालत ने इस तथ्य की अनदेखी की कि जब किसी कृत्य के लिए किसी व्यक्ति को दंडित करने के लिए विशेष कानून है तो उस स्थिति में आईपीसी के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता. यह प्रकरण सहकारी समितियां अधिनियम के प्रावधानों के तहत आता है.
अपील में वरिष्ठ अधिवक्ता विवेकराज बाजवा ने कहा, याचिकाकर्ताओं ने साल 1958 में खातेदारी अधिकार प्राप्त किए थे. राज्य सरकार ने भी विभिन्न मुकदमों में समिति के स्वामित्व को स्वीकार किया है. वर्तमान प्रकरण विवादित भूमि के अधिग्रहण के बाद उचित मुआवजा देने से बचने को लगाया गया है. इसमें किसी सरकारी अधिकारी को भी आरोपी नहीं बनाया गया. इसके अलावा मामले में धोखाधड़ी को लेकर कोई सामग्री रिकॉर्ड पर नहीं है.
याचिकाकर्ताओं के खातेदारी अधिकारों की वैधता अभी निर्धारित करनी शेष है. ऐसे में निचली अदालत के आदेश रद्द किए जाएं. इसके विरोध में शिकायतकर्ता व राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि निचली अदालत ने उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर याचिकाकर्ताओं के खिलाफ प्रसंज्ञान लिया और अपीलीय अदालत ने याचिकाकर्ताओं की अपील को खारिज कर निचली अदालत के प्रसंज्ञान आदेश को सही माना. दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद अदालत ने निचली अदालत के प्रसंज्ञान आदेश और उसके खिलाफ पेश अपील पर दिए आदेश रद्द कर दिया.
पढ़ें: हाईकोर्ट ने RGHS नियमों की अवहेलना पर राज्य सरकार व अस्पताल से मांगा जवाब
यह था मामला: संजय किशोर ने साल 2012 में परिवाद पेश कर कहा था कि साल 1953 में राज्य सरकार ने करीब 218 एकड़ भूमि सामूहिक कार्य के लिए किसान सहकारी समिति को 25 साल के लिए आवंटित की थी. यह अवधि 1978 में पूरी हो गई. इस समिति के मूल सदस्यों को दरकिनार कर आरोपियों ने भूमि पर कब्जा कर लिया. बाद में इस भूमि के फर्जी दस्तावेज बनाकर जेडीए की करधनी व पृथ्वीराज नगर योजना के लिए भूमि अवाप्त करने पर उसके मुआवजे के तौर पर भूखंड प्राप्त कर लिए.
Powered by Reporting Rajasthan Files
संबंधित ख़बरें

आतंकवाद निरोधक दलः राजस्थान के टोंक में आतंकी कनेक्शन!, हिरासत में बुरहान और बासित

जयपुर बदलेंगे पुलिस थानों के दायरे ! पुलिस व्यवस्था में बड़े बदलाव की कवायद, देखिए खास रिपोर्ट

राजस्थान स्कूल की छुट्टी कल: क्या 12 अगस्त को स्कूल और कॉलेज खुले रहेंगे या बंद रहेंगे? नवीनतम मौसम अपडेट, निवासी सलाह और बहुत कुछ देखें


