'कोटा मॉडल' पर बिहार की नजर, कैसी होगी नई कोचिंग सिटी.. क्या रुकेगा छात्रों का पलायन?
'कोटा मॉडल' पर बिहार की नजर, कैसी होगी नई कोचिंग सिटी.. क्या रुकेगा छात्रों का पलायन? बिहार में 'कोटा कोचिंग मॉडल' की तैयारी चल रही है. नई कोचिंग सिटी की प्लानिग है. जानें विशेषज्ञों की राय.. Published : July 9, 2026 at…

सौजन्य से:- ETV Bharat
'कोटा मॉडल' पर बिहार की नजर, कैसी होगी नई कोचिंग सिटी.. क्या रुकेगा छात्रों का पलायन?
बिहार में 'कोटा कोचिंग मॉडल' की तैयारी चल रही है. नई कोचिंग सिटी की प्लानिग है. जानें विशेषज्ञों की राय..
Published : July 9, 2026 at 6:57 PM IST
पटना: बिहार में शिक्षा व्यवस्था को नई दिशा देने की तैयारी शुरू हो चुकी है. सरकार अब केवल स्कूलों और कॉलेजों की गुणवत्ता सुधारने तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए भी ऐसा माहौल तैयार करना चाहती है, जिससे राज्य के लाखों विद्यार्थियों को बेहतर कोचिंग के लिए दूसरे राज्यों का रुख न करना पड़े. इसी सोच के तहत शिक्षा विभाग ने राजस्थान के कोटा मॉडल का अध्ययन शुरू किया है.
बिहार में 'कोटा कोचिंग मॉडल' की तैयारी: शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी हाल ही में अधिकारियों के प्रतिनिधिमंडल के साथ कोटा पहुंचे और वहां की कोचिंग व्यवस्था, रेगुलेशन पॉलिसी, छात्र सुविधाओं तथा प्रशासनिक मॉडल को करीब से समझा. अब सवाल यह है कि आखिर कोटा मॉडल क्या है, बिहार में बनने वाली प्रस्तावित कोचिंग सिटी कैसी होगी और क्या यह राज्य के शिक्षा के स्वरूप को बदलने में सफल होगी?
एजुकेशन सिटी विकसित करने की योजना: बिहार सरकार लंबे समय से राज्य में एक अत्याधुनिक एजुकेशन सिटी विकसित करने की योजना पर काम कर रही है. पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी राज्य में एजुकेशन सिटी विकसित करने की घोषणा की थी. अब शिक्षा विभाग की कोशिश है कि उसी एजुकेशन सिटी के भीतर एक सुव्यवस्थित और आधुनिक कोचिंग सिटी भी विकसित की जाए. विभाग का मानना है कि यदि विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण कोचिंग, सुरक्षित छात्रावास, पुस्तकालय, करियर काउंसिलिंग, डिजिटल लर्निंग और अन्य सुविधाएं एक ही परिसर में मिलेंगी तो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए होने वाला पलायन काफी हद तक कम किया जा सकेगा.
राजस्थान गए थे शिक्षा मंत्री: इसी उद्देश्य से शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी ने राजस्थान का दौरा किया. उन्होंने वहां के उपमुख्यमंत्री और शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक कर कोटा मॉडल की बारीकियों को समझा. खास तौर पर यह जानने का प्रयास किया गया कि किस तरह एक शहर को पूरी तरह शिक्षा आधारित अर्थव्यवस्था के रूप में विकसित किया गया, वहां कोचिंग संस्थानों के संचालन के लिए किस प्रकार की नीति बनाई गई और विद्यार्थियों की सुरक्षा तथा गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए कौन-कौन से मानक लागू किए गए हैं.
शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी का कहना है कि बिहार सरकार शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक सुधार और नवाचार के लिए प्रतिबद्ध है. देश के अलग-अलग राज्यों में लागू सफल मॉडलों का अध्ययन कर उन्हें बिहार की आवश्यकताओं के अनुरूप लागू करने का प्रयास किया जाएगा. उनका कहना है कि सरकार की प्राथमिकता है कि राज्य के विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की बेहतर तैयारी की सुविधाएं बिहार में ही उपलब्ध हों, ताकि उन्हें कोटा, दिल्ली, प्रयागराज या अन्य शहरों पर निर्भर नहीं रहना पड़े.
नई कोचिंग नियमावली आएगी: शिक्षा विभाग केवल कोचिंग सिटी की योजना पर ही काम नहीं कर रहा, बल्कि राज्य में नई कोचिंग नियमावली भी तैयार की जा रही है. शिक्षा मंत्री पहले ही कह चुके हैं कि अगले कुछ महीनों में नई नियमावली लागू की जा सकती है. इसका उद्देश्य कोचिंग संस्थानों के संचालन में पारदर्शिता लाना, विद्यार्थियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और बुनियादी सुविधाओं के न्यूनतम मानक तय करना है. हाल के वर्षों में पटना समेत कई शहरों में कोचिंग संस्थानों में सुरक्षा व्यवस्था और भवन मानकों को लेकर सवाल उठते रहे हैं.
वर्तमान समय में पटना का नया टोला और बोरिंग रोड इलाका बिहार का सबसे बड़ा कोचिंग हब माना जाता है. यहां हजारों विद्यार्थी प्रतिदिन प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए पहुंचते हैं. लेकिन समय के साथ इन इलाकों में भीड़ इतनी बढ़ गई है कि सड़कें संकरी पड़ गई हैं और अधिकांश भवन बिना दीर्घकालिक योजना के विकसित हुए हैं. कई स्थानों पर पार्किंग, अग्नि सुरक्षा, आपातकालीन निकास और खुले स्थान जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव देखने को मिलता है. ऐसे में किसी भी बड़ी आपदा की स्थिति में जोखिम की आशंका बनी रहती है.
यही वजह है कि सरकार अब पटना के बाहरी इलाके में पूरी योजना के साथ नया कोचिंग सिटी विकसित करना चाहती है. शिक्षा विभाग के सूत्रों के अनुसार यह परियोजना प्रस्तावित एजुकेशन सिटी का हिस्सा होगी. शुरुआत में सोनपुर क्षेत्र में एजुकेशन सिटी विकसित करने पर विचार हुआ था, बाद में बिहटा-विक्रम क्षेत्र का नाम सामने आया. अब फतुहा क्षेत्र में बड़े भूखंड पर इस परियोजना को विकसित करने की संभावनाओं पर काम चल रहा है. यदि योजना मूर्त रूप लेती है तो यहां स्कूल, कॉलेज, कोचिंग संस्थान, छात्रावास, अस्पताल, पुस्तकालय, ऑडिटोरियम, खेल परिसर और अन्य शैक्षणिक सुविधाएं एकीकृत रूप से विकसित की जाएंगी.
क्या है कोटा मॉडल?: ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर कोटा मॉडल है क्या, जिसकी चर्चा पूरे देश में होती है. शिक्षा विभाग को करीब 35 वर्षों से कवर कर रहे वरिष्ठ पत्रकार लक्ष्मीकांत सजल बताते हैं कि कोटा मॉडल दरअसल प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का एक संगठित शैक्षणिक ढांचा है. इसकी शुरुआत राजस्थान के कोटा शहर से हुई और धीरे-धीरे यह शहर इंजीनियरिंग और मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी का राष्ट्रीय केंद्र बन गया. यहां केवल कोचिंग संस्थान ही नहीं, बल्कि उनके आसपास पूरी शिक्षा आधारित अर्थव्यवस्था विकसित हुई, जिसमें छात्रावास, पुस्तकालय, टेस्ट सीरीज, डिजिटल लर्निंग, करियर काउंसिलिंग और विद्यार्थियों के लिए सुरक्षित वातावरण एक साथ उपलब्ध कराया गया.
लक्ष्मीकांत सजल बताते हैं कि हर वर्ष देशभर से लाखों विद्यार्थी कोटा पहुंचते हैं. अकेले बिहार से ही करीब 60 हजार छात्र मेडिकल और इंजीनियरिंग की तैयारी के लिए वहां जाते हैं. दिलचस्प बात यह है कि कोटा को देश का सबसे बड़ा कोचिंग हब बनाने में बड़ी भूमिका बिहार के शिक्षकों और विद्यार्थियों की भी रही. 1990 और 2000 के दशक में बिहार में रंगदारी, अपराध और असुरक्षा का माहौल बढ़ने के कारण कई प्रतिष्ठित शिक्षक कोटा चले गए. उनके साथ बड़ी संख्या में विद्यार्थी भी वहां पहुंचने लगे. समय के साथ कोटा के विद्यार्थियों की सफलता दर बढ़ी और यह शहर पूरे देश में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की पहचान बन गया.
समय के साथ कोटा मॉडल भी विकसित: लक्ष्मीकांत सजल कहते हैं कि पहले विद्यार्थी 12वीं के बाद एक वर्षीय टारगेट कोर्स के लिए वहां जाते थे लेकिन बाद में फाउंडेशन कोर्स शुरू हुए. अब दसवीं के बाद ही विद्यार्थी 11वीं-12वीं की पढ़ाई के साथ मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी शुरू कर देते हैं. कोचिंग संस्थानों के साथ स्कूलों का समन्वय, नियमित टेस्ट, मेरिट आधारित स्कॉलरशिप, चौबीसों घंटे शैक्षणिक सहायता और विद्यार्थियों की प्रगति की सतत निगरानी इस मॉडल की सबसे बड़ी विशेषता मानी जाती है. यही वजह है कि कोटा आज केवल एक शहर नहीं, बल्कि शिक्षा आधारित इकोसिस्टम का उदाहरण बन चुका है.
"कोटा मॉडल की सबसे बड़ी सफलता केवल बेहतर कोचिंग संस्थानों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे पूरी तरह नियोजित शैक्षणिक इकोसिस्टम है. विद्यार्थियों के रहने, पढ़ने, स्वास्थ्य, परिवहन, पुस्तकालय, टेस्टिंग सिस्टम और करियर काउंसिलिंग तक की सुविधाओं को एक ही व्यवस्था में जोड़ दिया गया है. यही कारण है कि बिहार सरकार भी केवल कुछ बड़े कोचिंग संस्थान विकसित करने की बजाय एक ऐसे शिक्षा केंद्र की परिकल्पना कर रही है."- लक्ष्मीकांत सजल, वरिष्ठ पत्रकार
लक्ष्मीकांत सजल बताते हैं कि बिहार में प्रस्तावित कोचिंग सिटी केवल कोचिंग संस्थानों का समूह नहीं होगी, बल्कि यह राज्य सरकार की एजुकेशन सिटी परियोजना का हिस्सा होगी. पूर्व में इस परियोजना को सोनपुर में विकसित करने की योजना बनी थी, बाद में बिहटा-विक्रम क्षेत्र पर चर्चा हुई और अब फतुहा क्षेत्र में फतुहा विकास प्राधिकरण से मिलकर शिक्षा विभाग और राजस्व विभाग 600 एकड़ की बड़े भूखंड को अधिग्रहण में लगे हुए हैं. प्रस्तावित एजुकेशन सिटी में स्कूल, कॉलेज, कोचिंग संस्थान, पुस्तकालय, छात्रावास, अस्पताल, ऑडिटोरियम, खेल परिसर जैसी सुविधाएं विकसित करने की परिकल्पना की गई है.
क्या कहते हैं शिक्षा विशेषज्ञ?: हालांकि, शिक्षा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कोटा की नकल कर देने से बिहार में वैसी सफलता नहीं मिलेगी. पटना में वर्षों से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने वाले शिक्षक रहमांशु कुमार का कहना है कि कोटा और पटना की जरूरतें पूरी तरह अलग हैं. कोटा में आने वाले अधिकांश विद्यार्थी मेडिकल और इंजीनियरिंग जैसी लंबी अवधि की तैयारी करते हैं और लाखों रुपये खर्च करने की क्षमता रखते हैं, जबकि पटना आने वाले अधिकांश छात्र बीपीएससी, एसएससी, रेलवे, बैंकिंग, पुलिस और अन्य सरकारी नौकरियों की तैयारी करते हैं, जिनकी आर्थिक स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर होती है और वे कम लागत में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा चाहते हैं.
व्यापक विचार-विमर्श हो: रहमांशु कुमार का कहना है कि बिहार में कोचिंग सिटी विकसित करने से पहले यहां के शिक्षकों और शिक्षा विशेषज्ञों से व्यापक विचार-विमर्श होना चाहिए. उनका मानना है कि यदि बिना स्थानीय जरूरतों को समझे कोटा मॉडल को ज्यों का त्यों लागू किया गया तो उसके सफल होने की संभावना कम होगी लेकिन यदि बिहार की सामाजिक, आर्थिक और भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए नया मॉडल तैयार किया जाए तो यह देश के सबसे सफल शिक्षा प्रोजेक्ट्स में शामिल हो सकता है.
"सबसे पहले बुनियादी सुविधाओं पर ध्यान देना होगा. प्रस्तावित कोचिंग सिटी रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड और प्रमुख सड़कों से बेहतर तरीके से जुड़ी होनी चाहिए ताकि दूर-दराज के जिलों से आने वाले विद्यार्थियों को आवागमन में परेशानी न हो. इसके अलावा पर्याप्त सार्वजनिक परिवहन, चौड़ी सड़कें, पार्किंग, सुरक्षित छात्रावास, स्वच्छ पेयजल, इंटरनेट, स्वास्थ्य सेवाएं और चौबीसों घंटे सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी. किसी भी नए शहर को विकसित होने में वर्षों लगते हैं, इसलिए दीर्घकालिक योजना सबसे महत्वपूर्ण होगी."- रहमांशु कुमार, शिक्षक
सकारात्मक सोच का स्वागत होना चाहिए: प्रतियोगी परीक्षाओं के शिक्षक कुमार प्रियांक भी मानते हैं कि सरकार यदि सकारात्मक सोच के साथ कोचिंग सिटी विकसित करती है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए. हालांकि वह यह भी कहते हैं कि सरकार को कोटा के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पक्षों का अध्ययन करना चाहिए. हाल के वर्षों में कोटा में विद्यार्थियों की संख्या में आई कमी, मानसिक दबाव, आत्महत्या जैसी घटनाओं और अत्यधिक व्यावसायीकरण से भी सीख लेने की जरूरत है. बिहार में बनने वाला मॉडल केवल परीक्षा परिणामों पर नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के समग्र विकास पर आधारित होना चाहिए.
नियमावली का कड़ाई से पालन हो: कुमार प्रियांक का कहना है कि वर्तमान समय में पटना के अधिकांश कोचिंग संस्थान घनी आबादी वाले इलाकों में संचालित हो रहे हैं. 2010 में बनी नियमावली के अनुरूप कई भवनों में प्रवेश और निकास के लिए अलग-अलग रास्ते तक नहीं हैं. यदि नई कोचिंग सिटी विकसित होती है तो वहां भवन निर्माण से लेकर अग्नि सुरक्षा, आपातकालीन निकास, खुला स्थान और छात्र सुरक्षा के सभी मानकों का कड़ाई से पालन कराया जाना चाहिए. इससे विद्यार्थियों के साथ-साथ अभिभावकों का भरोसा भी बढ़ेगा.
गुणवत्ता के निर्धारित मानक जरूरी: वह एक और महत्वपूर्ण सुझाव देते हैं. उनके अनुसार नई कोचिंग सिटी में केवल वही संस्थान संचालित करने की अनुमति मिलनी चाहिए, जो गुणवत्ता के निर्धारित मानकों पर खरे उतरें. इसके लिए शिक्षकों की शैक्षणिक योग्यता, अनुभव और परिणामों का मूल्यांकन होना चाहिए. उनका कहना है कि शिक्षा केवल व्यवसाय नहीं है और यदि गुणवत्तापूर्ण शिक्षक नहीं होंगे तो अत्याधुनिक भवन भी विद्यार्थियों को सफलता नहीं दिला पाएंगे.
"विद्यार्थियों के रहने की व्यवस्था को भी नीति का हिस्सा बनाया जाना चाहिए. कोचिंग सिटी के आसपास बनने वाले लॉज और छात्रावासों के लिए भी स्पष्ट नियम होने चाहिए ताकि मनमाना किराया वसूला न जा सके. कमरों का आकार, वेंटिलेशन, साफ-सफाई, सुरक्षा, भोजन और अन्य सुविधाओं के न्यूनतम मानक तय किए जाने चाहिए. इससे विद्यार्थियों का आर्थिक और मानसिक दबाव दोनों कम होगा."- कुमार प्रियांक, शिक्षक
क्या है आर्थिक पहलू?: इस पूरी परियोजना का एक बड़ा पहलू आर्थिक भी है. अर्थशास्त्री विद्यार्थी विकास बताते हैं कि बिहार में पंजीकृत कोचिंग संस्थानों की संख्या 6500 से अधिक है, जबकि अकेले पटना में करीब 1300 कोचिंग संस्थान संचालित हो रहे हैं. यदि कोचिंग फीस, छात्रावास, पीजी, मकान किराया, भोजन, परिवहन, पुस्तकें, स्टेशनरी और अन्य सेवाओं को जोड़ दिया जाए तो केवल पटना की कोचिंग इकोनॉमी का आकार लगभग 15 हजार करोड़ रुपये तक पहुंचता है. यही कारण है कि कोचिंग अब केवल शिक्षा का विषय नहीं, बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है.
शिक्षा क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रहेगा: विद्यार्थी विकास का मानना है कि यदि सरकार योजनाबद्ध तरीके से आधुनिक कोचिंग सिटी विकसित करती है तो इसका लाभ केवल शिक्षा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा. इससे निर्माण उद्योग, परिवहन, होटल, रेस्टोरेंट, किराये के मकान, स्वास्थ्य सेवाएं, पुस्तक प्रकाशन, डिजिटल शिक्षा, स्थानीय व्यापार और हजारों प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे. एक सफल कोचिंग सिटी आसपास के पूरे क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों को नई गति दे सकती है.
कोचिंग की जरूरत न्यूनतम ही आदर्श स्थिति: हालांकि वह यह भी स्पष्ट करते हैं कि किसी भी राज्य का लक्ष्य केवल कोचिंग इंडस्ट्री को बढ़ाना नहीं होना चाहिए. उनका कहना है कि आदर्श स्थिति वही होगी जब स्कूलों और कॉलेजों में शिक्षा का स्तर इतना मजबूत हो कि विद्यार्थियों को कोचिंग की जरूरत न्यूनतम रह जाए लेकिन वर्तमान प्रतिस्पर्धी दौर में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए विशेष मार्गदर्शन की आवश्यकता बनी हुई है. वे कहते हैं, 'यदि कोचिंग सिटी विकसित करनी ही है तो उसे अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप और पूरी योजना के साथ विकसित किया जाना चाहिए.'
क्या है चुनौती?: दरअसल, बिहार के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल एक नया परिसर बनाना नहीं, बल्कि ऐसा शैक्षणिक माहौल तैयार करना है जो विद्यार्थियों को गुणवत्ता, सुरक्षा और अवसर तीनों उपलब्ध करा सके. यदि प्रस्तावित कोचिंग सिटी में आधुनिक अधोसंरचना, सक्षम शिक्षक, पारदर्शी नियमन, बेहतर परिवहन, उचित शुल्क व्यवस्था, सुरक्षित छात्रावास और डिजिटल संसाधनों का समावेश किया जाता है तो यह राज्य के शिक्षा परिदृश्य में बड़ा बदलाव ला सकती है. वहीं यदि यह परियोजना केवल भवन निर्माण तक सीमित रह गई तो अपेक्षित परिणाम मिलना मुश्किल होगा.
फिलहाल शिक्षा विभाग राजस्थान के अनुभवों का अध्ययन कर रहा है और नई कोचिंग नियमावली भी तैयार की जा रही है. ऐसे में आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि बिहार अपनी प्रस्तावित एजुकेशन सिटी और कोचिंग सिटी को किस स्वरूप में विकसित करता है. यदि यह परियोजना स्थानीय जरूरतों, विशेषज्ञों की सलाह और विद्यार्थियों की अपेक्षाओं के अनुरूप लागू होती है तो यह न केवल राज्य से होने वाले शैक्षणिक पलायन को कम कर सकती है, बल्कि बिहार को पूर्वी भारत के एक बड़े शिक्षा केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है.
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