जयपुर में क्या है इंटरनेट बंद करने की प्रक्रिया और नियम?
भारत में इंटरनेट बंद करने के लिए तय नियम और प्रक्रिया है. साल 2017 में केंद्र सरकार ने टेम्पररी सस्पेंशन ऑफ टेलीकॉम सर्विसेज (पब्लिक इमरजेंसी या पब्लिक सेफ्टी) रूल्स लागू किए थे.

सौजन्य से:- AajTak
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जयपुर में सोमवार को कई लोगों को मोबाइल इंटरनेट न चलने की परेशानी का सामना करना पड़ा. इसकी वजह कोई तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि जिला प्रशासन का एक एहतियाती आदेश था. जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) की ओर से प्रस्तावित अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई को देखते हुए प्रशासन ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए इंटरनेट सेवाओं पर अस्थायी रोक लगा दी.
JDA ने जानकारी दी कि 8 जून 2026 को होने वाली कार्रवाई के दौरान अफवाहों और भ्रामक सूचनाओं के प्रसार की आशंका को देखते हुए यह फैसला लिया गया. संभागीय आयुक्त वी. सरवन कुमार की ओर से जारी आदेश में कहा गया कि सोशल मीडिया और इंटरनेट आधारित सेवाओं के दुरुपयोग से सार्वजनिक शांति भंग होने की संभावना को देखते हुए मोबाइल इंटरनेट सेवाएं अस्थायी रूप से निलंबित की गई हैं.
सरकार कब बंद कर सकती है इंटरनेट?
कई लोगों के मन में सवाल उठता है कि क्या सरकार कभी भी इंटरनेट बंद कर सकती है? इसका जवाब है नहीं. भारत में इंटरनेट बंद करने के लिए तय नियम और प्रक्रिया है.
साल 2017 में केंद्र सरकार ने टेम्पररी सस्पेंशन ऑफ टेलीकॉम सर्विसेज (पब्लिक इमरजेंसी या पब्लिक सेफ्टी) रूल्स लागू किए थे. ये नियम भारतीय टेलीग्राफ एक्ट, 1885 के तहत बनाए गए हैं.
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इन नियमों के मुताबिक, किसी राज्य में इंटरनेट बंद करने का आदेश केवल राज्य के गृह सचिव या केंद्र सरकार के मामले में केंद्रीय गृह सचिव जारी कर सकते हैं. आदेश में यह भी बताना जरूरी होता है कि इंटरनेट बंद करने की जरूरत क्यों पड़ी.
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आदेश की समीक्षा भी होती है
इंटरनेट बंद करने का आदेश जारी होने के बाद उसकी समीक्षा भी की जाती है. आदेश को अगले दिन एक समीक्षा समिति के पास भेजा जाता है और समिति पांच दिनों के भीतर जांच करती है कि यह फैसला कानून के मुताबिक है या नहीं.
राज्यों में इस समिति में मुख्य सचिव, विधि विभाग के वरिष्ठ अधिकारी और राज्य सरकार के अन्य वरिष्ठ अधिकारी शामिल होते हैं.
पहले कैसे बंद होता था इंटरनेट?
2017 के नियम आने से पहले इंटरनेट बंद करने के लिए अक्सर दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 144 का इस्तेमाल किया जाता था. यह वही धारा है जिसके तहत प्रशासन किसी संवेदनशील स्थिति में लोगों के जुटने या कुछ गतिविधियों पर रोक लगा सकता है.
हालांकि आज भी कई जगह स्थानीय प्रशासन धारा 144 के तहत इंटरनेट प्रतिबंध से जुड़े आदेश जारी करता है.
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सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने 2020 में इंटरनेट बंदी को लेकर अहम टिप्पणी की थी. अदालत ने कहा था कि इंटरनेट पर अनिश्चितकालीन रोक नहीं लगाई जा सकती और ऐसे आदेशों की नियमित समीक्षा जरूरी है. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इंटरनेट तक पहुंच आज के समय में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यापार जैसे अधिकारों से जुड़ी हुई है.
जयपुर में क्यों लिया गया फैसला?
प्रशासन का कहना है कि अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान सोशल मीडिया पर अफवाहें फैलने, भीड़ जुटने या तनाव पैदा होने की आशंका थी. इसी कारण एहतियातन मोबाइल इंटरनेट सेवाओं पर अस्थायी रोक लगाई गई, ताकि कानून-व्यवस्था बनी रहे और किसी भी तरह की अप्रिय घटना से बचा जा सके.
यानी सरकार इंटरनेट बंद कर सकती है, लेकिन इसके लिए सार्वजनिक सुरक्षा, आपात स्थिति या कानून-व्यवस्था से जुड़ा ठोस कारण होना जरूरी है और इसके लिए तय कानूनी प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है.
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