'जयपुर सत्याग्रह' की अनकही कहानी, गांधीजी के 'हरिजन' की आवाज से कांपी ब्रिटिश हुकूमत, जनता ने रचा इतिहास
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सौजन्य से:- Amar Ujala
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'जयपुर सत्याग्रह' की अनकही कहानी, गांधीजी के 'हरिजन' की आवाज से कांपी ब्रिटिश हुकूमत, जनता ने रचा इतिहास
Sat, 15 Aug 2026 04:16 PM IST
प्रिया वर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
Published by: प्रिया वर्मा
Updated Sat, 15 Aug 2026 04:16 PM IST
सार
जयपुर सत्याग्रह स्वतंत्रता आंदोलन का ऐसा अध्याय है, जिसमें महात्मा गांधी का सीधा जुड़ाव रहा। वरिष्ठ पत्रकार एवं विधायक गोपाल शर्मा के अनुसार गांधीजी ने जमनालाल बजाज की गिरफ्तारी के बाद आंदोलन को मजबूती दी।
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विस्तार
देश आजादी की 80वीं वर्षगांठ की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में स्वतंत्रता आंदोलन में जयपुर की भूमिका और यहां हुए संघर्ष की अनकही कहानियां एक बार फिर चर्चा में हैं। सिविल लाइंस विधायक और वरिष्ठ पत्रकार गोपाल शर्मा ने जयपुर सत्याग्रह, जमनालाल बजाज की गिरफ्तारी और महात्मा गांधी के जयपुर से जुड़े संबंधों के कई महत्वपूर्ण प्रसंग साझा किए।
गोपाल शर्मा के अनुसार आजादी के आंदोलन के दौरान जयपुर में महाराजा और कांग्रेस नेताओं के बीच एक तरह की सहमति बनी हुई थी। इसके तहत महाराजा आंदोलनकारियों को गिरफ्तार नहीं करेंगे और कांग्रेस भी जयपुर में सीधे तौर पर आजादी का आंदोलन नहीं चलाएगी। हालांकि इस समझौते के बावजूद जयपुर की जनता में स्वतंत्रता की चेतना लगातार मजबूत होती गई और लोगों ने आंदोलन से अपना जुड़ाव बनाए रखा। उन्होंने बताया कि जयपुर सत्याग्रह के दौरान जमनालाल बजाज की गिरफ्तारी और उन्हें जेल भेजे जाने के बाद महात्मा गांधी ने आंदोलन को संभालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गांधीजी का जयपुर से केवल राजनीतिक ही नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष और गहरा जुड़ाव था। वे जयपुर आए भी थे और यहां के आंदोलन की स्थिति पर लगातार नजर रखते थे।
गोपाल शर्मा ने बताया कि गांधीजी ने अपने पत्र ‘हरिजन’ में जयपुर सत्याग्रह को लेकर करीब 20 से अधिक लेख लिखे। इन लेखों के जरिए उन्होंने आंदोलन को वैचारिक और नैतिक मजबूती दी तथा देशभर में जयपुर के संघर्ष को सामने रखा। उस दौर में जयपुर के प्रधानमंत्री ब्यूचैम्प की ओर से आंदोलन को दबाने के लिए कड़े तेवर दिखाए जाने का भी उल्लेख मिलता है। गोपाल शर्मा के अनुसार ब्यूचैम्प ने यहां तक कहा था कि आंदोलन को तोप से कुचल दिया जाएगा। इसके जवाब में गांधीजी ने कड़ा रुख अपनाते हुए लिखा कि भारत में तोप चलाने वाला नहीं रह पाएगा और बाद में ब्यूचैम्प को अपना पद छोड़कर जाना पड़ा।
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ये भी पढ़ें: Rajasthan: जयपुर में स्वतंत्रता दिवस पर राज्यपाल बागडे ने फहराया तिरंगा, पुलिस मुख्यालय में भी हुआ ध्वजारोहण
जयपुर सत्याग्रह के दौरान जमनालाल बजाज, हरिभाऊ उपाध्याय सहित कई नेता गांधीजी से सलाह लेने साबरमती जाते थे। गांधीजी के निर्देश और विचारों के आधार पर आंदोलन की रणनीति तय की जाती थी। उस समय नेताओं का जनता से सीधा संवाद आंदोलन की बड़ी ताकत था। गोपाल शर्मा के अनुसार कई नेता घंटों तक लगातार भाषण देते थे। छह-सात घंटे तक चलने वाले भाषणों के किस्से भी उस दौर से जुड़े हैं। उनका उद्देश्य केवल अंग्रेजी शासन से आजादी हासिल करना नहीं था, बल्कि जनता को आंदोलन में सक्रिय भागीदार बनाना भी था।
उस दौर का मूल संदेश यही था कि देश की आजादी और विकास केवल नेताओं के प्रयास से संभव नहीं, बल्कि जनता की सक्रिय भागीदारी से ही हासिल किया जा सकता है। इसी भावना को एक कहावत के जरिए भी समझाया जाता था- भगवान से प्रार्थना की जा सकती है लेकिन प्रयास स्वयं करना पड़ता है। यानी बदलाव के लिए सिर्फ इंतजार नहीं, बल्कि खुद मैदान में उतरना जरूरी है।
जयपुर सत्याग्रह की यह कहानी बताती है कि स्वतंत्रता आंदोलन केवल बड़े राष्ट्रीय केंद्रों तक सीमित नहीं था। जयपुर जैसे रियासती क्षेत्रों में भी जनता, स्थानीय नेताओं और राष्ट्रीय नेतृत्व के बीच बने संबंधों ने आजादी की चेतना को मजबूत किया। गांधीजी का ‘हरिजन’ के माध्यम से जयपुर सत्याग्रह को लगातार उठाना इस संघर्ष के राष्ट्रीय महत्व को भी दर्शाता है।
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गोपाल शर्मा के अनुसार आजादी के आंदोलन के दौरान जयपुर में महाराजा और कांग्रेस नेताओं के बीच एक तरह की सहमति बनी हुई थी। इसके तहत महाराजा आंदोलनकारियों को गिरफ्तार नहीं करेंगे और कांग्रेस भी जयपुर में सीधे तौर पर आजादी का आंदोलन नहीं चलाएगी। हालांकि इस समझौते के बावजूद जयपुर की जनता में स्वतंत्रता की चेतना लगातार मजबूत होती गई और लोगों ने आंदोलन से अपना जुड़ाव बनाए रखा। उन्होंने बताया कि जयपुर सत्याग्रह के दौरान जमनालाल बजाज की गिरफ्तारी और उन्हें जेल भेजे जाने के बाद महात्मा गांधी ने आंदोलन को संभालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गांधीजी का जयपुर से केवल राजनीतिक ही नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष और गहरा जुड़ाव था। वे जयपुर आए भी थे और यहां के आंदोलन की स्थिति पर लगातार नजर रखते थे।
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गोपाल शर्मा ने बताया कि गांधीजी ने अपने पत्र ‘हरिजन’ में जयपुर सत्याग्रह को लेकर करीब 20 से अधिक लेख लिखे। इन लेखों के जरिए उन्होंने आंदोलन को वैचारिक और नैतिक मजबूती दी तथा देशभर में जयपुर के संघर्ष को सामने रखा। उस दौर में जयपुर के प्रधानमंत्री ब्यूचैम्प की ओर से आंदोलन को दबाने के लिए कड़े तेवर दिखाए जाने का भी उल्लेख मिलता है। गोपाल शर्मा के अनुसार ब्यूचैम्प ने यहां तक कहा था कि आंदोलन को तोप से कुचल दिया जाएगा। इसके जवाब में गांधीजी ने कड़ा रुख अपनाते हुए लिखा कि भारत में तोप चलाने वाला नहीं रह पाएगा और बाद में ब्यूचैम्प को अपना पद छोड़कर जाना पड़ा।
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जयपुर सत्याग्रह के दौरान जमनालाल बजाज, हरिभाऊ उपाध्याय सहित कई नेता गांधीजी से सलाह लेने साबरमती जाते थे। गांधीजी के निर्देश और विचारों के आधार पर आंदोलन की रणनीति तय की जाती थी। उस समय नेताओं का जनता से सीधा संवाद आंदोलन की बड़ी ताकत था। गोपाल शर्मा के अनुसार कई नेता घंटों तक लगातार भाषण देते थे। छह-सात घंटे तक चलने वाले भाषणों के किस्से भी उस दौर से जुड़े हैं। उनका उद्देश्य केवल अंग्रेजी शासन से आजादी हासिल करना नहीं था, बल्कि जनता को आंदोलन में सक्रिय भागीदार बनाना भी था।
उस दौर का मूल संदेश यही था कि देश की आजादी और विकास केवल नेताओं के प्रयास से संभव नहीं, बल्कि जनता की सक्रिय भागीदारी से ही हासिल किया जा सकता है। इसी भावना को एक कहावत के जरिए भी समझाया जाता था- भगवान से प्रार्थना की जा सकती है लेकिन प्रयास स्वयं करना पड़ता है। यानी बदलाव के लिए सिर्फ इंतजार नहीं, बल्कि खुद मैदान में उतरना जरूरी है।
जयपुर सत्याग्रह की यह कहानी बताती है कि स्वतंत्रता आंदोलन केवल बड़े राष्ट्रीय केंद्रों तक सीमित नहीं था। जयपुर जैसे रियासती क्षेत्रों में भी जनता, स्थानीय नेताओं और राष्ट्रीय नेतृत्व के बीच बने संबंधों ने आजादी की चेतना को मजबूत किया। गांधीजी का ‘हरिजन’ के माध्यम से जयपुर सत्याग्रह को लगातार उठाना इस संघर्ष के राष्ट्रीय महत्व को भी दर्शाता है।
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