नागपुर: एमएनएलयू ने कोटा नियम उल्लंघन से जुड़ी द वायर की रिपोर्ट के बाद अलग पीएचडी दाखिले शुरू किए
मंगलुरु: महाराष्ट्र नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (एमएनएलयू) नागपुर के पीएचडी प्रोग्राम से अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों अन्य पिछड़ा वर्गों और हाशिए पर मौजूद दूसरे समुदायों के छात्रों को व्यतवस्थित रूप से बाहर रखने के बारे…

सौजन्य से:- The Wire - Hindi
मंगलुरु: महाराष्ट्र नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (एमएनएलयू) नागपुर के पीएचडी प्रोग्राम से अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों अन्य पिछड़ा वर्गों और हाशिए पर मौजूद दूसरे समुदायों के छात्रों को व्यतवस्थित रूप से बाहर रखने के बारे में 3 जून को द वायर ने एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की थी.
इसके एक दिन बाद यूनिवर्सिटी ने एक नया नोटिफिकेशन जारी किया- जिसमें उन समुदायों के छात्रों को लेने के लिए एक खास अभियान चलाया गया जिन्हें वह साल-दर-साल बाहर रखती आ रही थी.
इस नोटिफिकेशन में 19 सीटों का ज़िक्र था, जो हाशिए पर मौजूद अलग-अलग समूहों के छात्रों के लिए तय की गई थीं. हालांकि इसे ऊपर से देखने पर ऐसा लगता है कि यूनिवर्सिटी लंबे समय से चली आ रही गलतियों को सुधारने की कोशिश कर रही है, लेकिन असल में यह नया नोटिफिकेशन पहले से कहीं ज़्यादा नियमों का उल्लंघन करने वाला है.
पिछले साल यूनिवर्सिटी ने पीएचडी की 35 सीटों के लिए विज्ञापन निकाला था. इनमें 22 छात्रों का चयन हुआ, जो सभी अनारक्षित (सवर्ण) श्रेणी के थे. वहीं, आरक्षित श्रेणियों में केवल तीन ओबीसी उम्मीदवार (सात आरक्षित सीटों के मुकाबले) और खानाबदोश समुदाय के एक उम्मीदवार (तीन सीटों के मुकाबले) को ही दाखिला मिल पाया. कुल मिलाकर, यूनिवर्सिटी ने 25 छात्रों को दाखिला दिया, जबकि दस सीटें खाली रह गईं.
अब नए विज्ञापन के लागू होने के साथ कुल सीटों की संख्या बढ़कर 44 हो गई है. फिलहाल यह साफ़ नहीं है कि यूनिवर्सिटी खाली पड़ी 10 सीटों को भरने की योजना बना रही है या नहीं.
महाराष्ट्र की आरक्षण नीति के अनुसार, कुल सीटों में से 26 सीटें अलग-अलग आरक्षित श्रेणियों के छात्रों के लिए होनी चाहिए. हालांकि, यूनिवर्सिटी ने केवल 22 आरक्षित सीटों की अनुमति दी है.
इसके अलावा 18 सीटें अनारक्षित श्रेणी के उम्मीदवारों के लिए आवंटित की जानी चाहिए. हालांकि, पहले जारी नोटिफिकेशन के अनुसार यूनिवर्सिटी ने अब तक पहले ही इस श्रेणी से 22 छात्रों का चयन कर लिया है.
3 जून को द वायर ने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग में दीपक खरात की ओर से दर्ज कराई गई शिकायत के बारे में रिपोर्ट दी थी.
लॉ ग्रेजुएट खरात एक घुमंतू जनजाति से ताल्लुक रखते हैं और उन्हें यूनिवर्सिटी में पीएचडी में एडमिशन पाने के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच का दरवाज़ा खटखटाना पड़ा था.
हालांकि, उन्होंने एंट्रेंस टेस्ट पास कर लिया था और अपना रिसर्च प्रपोज़ल भी जमा कर दिया था, लेकिन फाइनल इंटरव्यू राउंड में उन्हें नहीं चुना गया. इस मामले में हाईकोर्ट ने यूनिवर्सिटी को कड़ी फटकार लगाई और आखिरकार खरात को एडमिशन मिल गया.
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कई अन्य बातों के अलावा यूनिवर्सिटी से यह भी कहा था कि वह आरक्षित श्रेणी के छात्रों के लिए लागू 50% कट-ऑफ को खत्म करे.
इस संबंध में जब यूनिवर्सिटी के वकील ने दावा किया कि खरात 50% कट-ऑफ की कैटेगरी में नहीं आते, तब जस्टिस अनिल पानसरे ने कहा, ‘यह तय करने वाले आप कौन होते हैं? आरक्षित कैटेगरी के छात्र के मामले में आपको थोड़ी नरमी बरतनी चाहिए.’ यह बात यूनिवर्सिटी के लिए जारी निर्देशों में से एक के तौर पर कोर्ट के आदेश में भी शामिल है.
अब अगर एमएनएलयू कट-ऑफ मार्क्स नहीं रख सकता, तो कई सवाल उठते हैं. यूनिवर्सिटी ने अब एंट्रेंस टेस्ट का एक नया राउंड कराने का फैसला क्यों किया है, जबकि हाईकोर्ट साफ़ कह चुका है कि अब इसकी ज़रूरत नहीं है? इसके साथ ही उन 20 छात्रों का क्या होगा जिन्होंने पहले परीक्षा दी और क्वालिफ़ाई किया, लेकिन उन्हें एडमिशन नहीं मिल सका?
भारत के सभी नेशनल लॉ स्कूलों में से महाराष्ट्र में बने तीन एनएलयू- नागपुर, औरंगाबाद और मुंबई तुलनात्मक रूप से नए हैं. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने एक दशक पहले इन यूनिवर्सिटीज़ को राज्य में लाने में अहम भूमिका निभाई थी.
फडणवीस के गृह क्षेत्र में स्थापित एमएनएलयू, नागपुर में 2015 से विजेंद्र कुमार ही वाइस-चांसलर (वीसी) हैं. वीसी होने के साथ-साथ कुमार डॉक्टोरल काउंसिल और रिसर्च कमेटी के चेयरमैन भी हैं और पीएचडी उम्मीदवारों के चयन में सीधी भूमिका निभाते हैं.
द वायर ने विजेंद्र कुमार, यूनिवर्सिटी के प्रॉक्टर विजय प्रताप तिवारी और रजिस्ट्रार दीपक भागवत को पत्र लिखा. जहां कुमार और भागवत ने कोई जवाब नहीं दिया, वहीं तिवारी ने कहा कि नए नोटिफिकेशन से जुड़े सवालों का जवाब सिर्फ़ वीसी ही दे सकते हैं.
तिवारी यूनिवर्सिटी के जनसंपर्क अधिकारी भी हैं और मीडिया के सवालों का जवाब देने की ज़िम्मेदारी उन्हीं की है. वीसी का जवाब मिलने पर इस खबर को अपडेट किया जाएगा.
नए नोटिफिकेशन के अनुसार, इच्छुक उम्मीदवार केवल जुलाई में ही परीक्षा दे सकते हैं.
मालूम हो कि पीएचडी प्रोग्राम का 2026 बैच पहले ही मार्च में शुरू हो चुका है और छात्र अपना कोर्सवर्क पूरा करने वाले हैं. आने वाले बैच में केवल अलग-अलग आरक्षित श्रेणियों के छात्र होंगे. खरात का कहना है कि इस कदम से यूनिवर्सिटी ने ‘छात्रों को उनकी जातिगत पहचान के आधार पर असल में अलग-थलग कर दिया है.’
वे बताते हैं, ‘पहला बैच सवर्णों के लिए है और नया बैच आरक्षित बैच के तौर पर जाना जाएगा.’
यूनिवर्सिटी अधिकारियों को भेजे गए सवालों में द वायर ने पूछा था कि क्या छात्रों को उनकी जाति के आधार पर अलग-अलग किया जा रहा है. इसका कोई जवाब नहीं मिला है.
गौरतलब है कि यह कोई इकलौता मामला नहीं है. 2017 से अब तक यूनिवर्सिटी में अलग-अलग आरक्षित श्रेणियों से कम से कम 89 छात्र होने चाहिए थे. लेकिन आंकड़ों से पता चलता है कि सिर्फ़ 22 छात्रों का ही चयन हुआ है.
ज्ञात हो कि आरक्षण एक संवैधानिक अधिकार है और छात्रों को दाखिला न देना इस अधिकार का साफ़ उल्लंघन है.
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