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गुरुकुल के द्वारा भारतीय संस्कृति की सिखाई जा रही सनातन संस्कार

जयपुर में एक गुरुकुल है जहां 12 वर्षों से बच्चों को वैदिक शिक्षा और संस्कारों की शिक्षा दी जा रही है। गुरुकुल के संस्थापक आचार्य योगेश पारीक का मानना है कि शिक्षा केवल रोजगार का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाली साधना है।

ETV Bharat के अनुसार29 जुलाई 2026 को 08:59 am बजे
गुरुकुल के द्वारा भारतीय संस्कृति की सिखाई जा रही सनातन संस्कार

सौजन्य से:- ETV Bharat

Guru Purnima : तकनीक के दौर में सनातन की पाठशाला, जयपुर का वो गुरुकुल जहां 12 साल से दी जा रही संस्कारों की शिक्षा

गुरु पूर्णिमा पर पढ़िए ऐसे गुरु की कहानी जो नई पीढ़ी को भारतीय सनातन संस्कृति का पाठ पढ़ा रहा हैं. अंकुर जाकड़ की रिपोर्ट...

Published : July 29, 2026 at 1:26 PM IST

जयपुर : 'गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरूर्साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः।। गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर जब पूरा देश गुरु परंपरा को नमन कर रहा है, तब ईटीवी भारत आपको ऐसे आचार्य से रूबरू करा रहा है, जिन्होंने आधुनिक और तकनीकी शिक्षा के इस दौर में भी भारतीय सनातन संस्कृति, संस्कार और वेद परंपरा की अलख जगाए रखी है. जयपुर के ब्रह्मपुरी क्षेत्र में संचालित उनका गुरुकुल पिछले 12 वर्षों से बच्चों को न केवल वैदिक शिक्षा दे रहा है, बल्कि उन्हें जीवन जीने की भारतीय शैली भी सिखा रहा है, वो भी पूरी तरह निशुल्क. इस गुरुकुल के संस्थापक आचार्य योगेश पारीक का मानना है कि शिक्षा केवल रोजगार का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाली साधना है.

गुरु का स्थान सर्वोच्च : आधुनिक शिक्षा के इस दौर में, जहां सफलता का पैमाना अक्सर डिग्री, नौकरी और पैकेज से तय होता है, वहीं जयपुर में गुरुकुल संचालित कर रहे आचार्य योगेश पारीक बच्चों को सबसे पहले अच्छा इंसान बनने की शिक्षा दे रहे हैं. आचार्य योगेश पारीक ने कहा कि भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान ब्रह्मा, विष्णु और महेश से भी ऊपर माना गया है.

'यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान।

शीश दियो जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान॥'

संत कबीर का प्रसिद्ध दोहा दोहराते हुए उन्होंने कहा कि माता-पिता और गुरु का ऋण जीवन में कभी चुकाया नहीं जा सकता. यही भावना उनके गुरुकुल की नींव है. आचार्य पारीक बताते हैं कि उनके गुरु ग्यारसी लाल वेदाचार्य का सपना था कि ऐसा गुरुकुल स्थापित हो, जहां छोटे-छोटे बालक यज्ञोपवीत धारण कर, शिखा बांधकर सनातन संस्कृति की पहचान बनें. गुरु के देवलोक गमन के बाद उन्होंने इस संकल्प को अपना जीवन ध्येय बना लिया. सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अपने घर से ही पांच बच्चों के साथ गुरुकुल की शुरुआत की और अब तक छह हजार से ज्यादा छात्र-छात्राओं को संस्कार शिक्षा से जोड़ चुके हैं.

घर की छत से शुरू हुई संस्कारों की पाठशाला : शुरुआत में आचार्य पारीक ने अपने घर की छत पर टीन शेड लगाकर बच्चों को पढ़ाना शुरू किया. जब बच्चों की संख्या बढ़ी तो पास के एक प्राइवेट स्कूल ने परिसर उपलब्ध कराया. वहां पहले शिविर में लगभग 70 बच्चों को वैदिक और संस्कार शिक्षा दी गई. धीरे-धीरे ये शिविर नियमित गुरुकुल गतिविधि में बदल गया. आचार्य पारीक ने कहा कि वेद पढ़ लेना पर्याप्त नहीं, व्यक्ति का संस्कारित होना अधिक आवश्यक है. इसी दिशा में बच्चों को आगे बढ़ाया गया. उनका मानना है कि आधुनिक विद्यालय ज्ञान देते हैं, लेकिन गुरुकुल जीवन की पद्धति सिखाता है.

12 वर्षों से लगातार चल रहा संस्कार अभियान : गुरुकुल के तहत संस्कार शिविर 12 वर्षों से निरंतर चल रहा है और हर वर्ष नए विद्यार्थी इससे जुड़ रहे हैं. तकनीकी और प्रतिस्पर्धी युग में गुरुकुल की प्रासंगिकता पर वे स्पष्ट कहते हैं कि वे आधुनिक शिक्षा के विरोधी नहीं हैं, न ही धन कमाना गलत है, लेकिन धन का सदुपयोग कैसे हो, जीवन किस दिशा में जाए, ये समझना आवश्यक है. उनके अनुसार गुरुकुल की शिक्षा कमाई के साधन नहीं, बल्कि कमाई के सही उपयोग की समझ विकसित करती है. आचार्य पारीक ने अपील की है कि सभी विद्यालयों में कम से कम एक पीरियड भारतीय संस्कृति, धर्म, नैतिकता और जीवन मूल्यों के लिए अवश्य होना चाहिए.

यज्ञोपवीत संस्कार के बाद ही प्रवेश : गुरुकुल में प्रवेश प्रक्रिया विशेष है. संस्कार शिविर के बाद इच्छुक विद्यार्थियों का यज्ञोपवीत संस्कार कराया जाता है. दशविध स्नान, संकल्प और वैदिक विधि से संस्कार सम्पन्न होने के बाद ही छात्र गुरुकुल से औपचारिक रूप से जुड़ते हैं. हर वर्ष लगभग 100 नए विद्यार्थी प्रवेश लेते हैं. गुरुकुल से जुड़े बच्चों को हर वर्ष ये संकल्प दिलाया जाता है कि वे अन्य बच्चों को भी वैदिक अध्ययन और संस्कार सिखाएंगे. कई विद्यार्थी मंदिरों और धार्मिक आयोजनों में जाकर बच्चों को हवन विधि, पाठ-पद्धति, तिलक, देवपूजन और भारतीय परंपराओं की जानकारी देते हैं.

विरोध भी मिला, लेकिन संकल्प नहीं डिगा : आचार्य पारीक ने बताया कि गुरुकुल चलाने के दौरान कई लोगों ने उन्हें समझाया कि वे अपने ही प्रतिस्पर्धी तैयार कर रहे हैं. निशुल्क शिक्षा देने के कारण वे आर्थिक लाभ वाले कई कार्यों से दूर हो जाते हैं, फिर भी उनका मानना है कि उनका उद्देश्य लाभ कमाना नहीं, बल्कि गुरु की प्रेरणा को आगे बढ़ाना और सनातन संस्कृति की सेवा करना है.

अवसाद से संतोष की ओर : आज के समय में बच्चों पर प्रतिस्पर्धा का भारी दबाव है. आचार्य योगेश पारीक का मानना है कि गुरुकुल बच्चों को संतोष, संयम और कृतज्ञता का पाठ पढ़ाता है. उन्हें सिखाया जाता है कि प्राप्त परिस्थितियों को ईश्वर का प्रसाद मानकर स्वीकार करें और कर्मपथ पर आगे बढ़ें. गुरुकुल में छात्रों को वैदिक अध्ययन कराया जाता है. बालकों को सस्वर रुद्राष्टाध्यायी और वेद मंत्र अध्ययन कराया जाता है, जबकि बालिकाओं को दुर्गा सप्तशती और सुंदरकांड का पाठ सिखाया जाता है. वरिष्ठ छात्रों को उन्नत वैदिक अध्ययन और संहिता अध्ययन कराया जाता है.

प्रमाणपत्र बनता है भविष्य का आधार : उन्होंने बताया कि हर वर्ष आयोजित वैदिक सम्मेलन में गुरुकुल के छात्रों को प्रमाणित प्रमाणपत्र दिए जाते हैं. देश-विदेश के मंदिरों और धार्मिक संस्थानों में कर्मकांड, पंचांग, नक्षत्र और वैदिक अध्ययन संबंधी योग्यता पूछी जाती है. ये प्रमाणपत्र छात्रों के लिए आधार तैयार करते हैं और आगे चलकर वे कर्मकांड और ज्योतिष के माध्यम से आजीविका भी अर्जित कर सकते हैं.

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ब्रह्मपुरी में हर घर से उठे वेदों की ध्वनि : ये गुरुकुल जयपुर के ब्रह्मपुरी क्षेत्र में संचालित है. आचार्य योगेश पारीक का अपने गुरुकुल को लेकर सपना है कि इस क्षेत्र के हर घर में वेदों की ध्वनि गूंजे और यहां से निकला छात्र देश ही नहीं, विदेशों में भी भारतीय वैदिक परंपरा का प्रतिनिधित्व करे. गुरु पूर्णिमा के अवसर पर उन्होंने समाज से आह्वान किया कि बच्चों को केवल करियर नहीं, संस्कार भी दें. अगली पीढ़ी में संस्कृति के बीज बो दिए जाएं, तो वही बच्चे आगे चलकर समाज को सही दिशा देंगे.

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