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कोटा: जब रूठते हैं इंद्रदेव, तब सड़क खोदकर की जाती है 'गड़े भेरूजी' की पूजा, फिर होती है झमाझम बारिश

कोटा: जब रूठते हैं इंद्रदेव, तब सड़क खोदकर की जाती है 'गड़े भेरूजी' की पूजा, फिर होती है झमाझम बारिश मान्यता है कि बारिश न होने पर खुदाई कर 'गड़े भेरूजी' की पूजा की जाती है, जिसके 24 घंटे में झमाझम बारिश शुरू होती है. Pu…

ETV Bharat के अनुसार20 जुलाई 2026 को 04:03 pm बजे
कोटा: जब रूठते हैं इंद्रदेव, तब सड़क खोदकर की जाती है 'गड़े भेरूजी' की पूजा, फिर होती है झमाझम बारिश

सौजन्य से:- ETV Bharat

कोटा: जब रूठते हैं इंद्रदेव, तब सड़क खोदकर की जाती है 'गड़े भेरूजी' की पूजा, फिर होती है झमाझम बारिश

मान्यता है कि बारिश न होने पर खुदाई कर 'गड़े भेरूजी' की पूजा की जाती है, जिसके 24 घंटे में झमाझम बारिश शुरू होती है.

Published : July 20, 2026 at 8:58 PM IST

कोटा: शहर की धरती पर एक ऐसा अनोखा मंदिर है जो सामान्य मंदिरों से बिल्कुल अलग है. यह मंदिर सड़क के करीब 5 फीट नीचे जमीन में गड़ा हुआ है, जब आसमान से बारिश नहीं बरसती और सूखा पड़ने लगता है, तब स्थानीय लोग भगवान भेरुजी को याद करते हैं. 'गड़े भेरुजी' कहलाने वाले इस मंदिर को निकालकर पूजा-अर्चना की जाती है और मान्यता है कि पूजा के बाद बारिश होती है. इस बार हाड़ौती संभाग में बारिश की कमी काफी गंभीर है, जिसके चलते फिर से इस परंपरा को निभाने की मांग जोर पकड़ रही है.

बारिश कराने की अनोखी परंपरा: इस बार हाड़ौती संभाग में काफी कम बारिश हुई है. यहां के 80 डैमों की कुल क्षमता 1569.01 एमसीएम है, जबकि पिछले साल इनमें करीब 65 प्रतिशत यानी 1019.23 एमसीएम पानी था. इस साल 2026 में मात्र 38 प्रतिशत यानी 591.98 एमसीएम पानी है. पूर्व पार्षद और भाजपा नेता महेश गौतम लल्ली ने बताया कि रियासत काल में कोटिया भील के नाम से कोटा बसाया गया था. इसके बाद यहां कोटा राज परिवार की हुकूमत चली. उसी दौरान पूरे संभाग में बारिश नहीं हुई थी, तब साधु-संतों ने कोटा दरबार को बताया कि पाटन पोल इलाके में सती चबूतरे के नजदीक भेरुजी जमीन में गड़े हुए हैं. इस मंदिर को निकालकर पूजा की जानी चाहिए. उन्होंने कहा था कि उनकी पूजा से अच्छी बारिश हो जाएगी.

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करीब 200 पुरानी है परंपरा: महेश गौतम लल्ली ने बताया कि दरबार ने राजपुरोहित को निर्देश दिए और गड़े भेरुजी को निकालकर पूजा करवाई गई. इसके बाद पूरे संभाग में अच्छी बारिश हुई, तब से जिस साल भी बारिश नहीं होती, गड़े भेरुजी को निकाला जाता है और उनकी पूजा करवाई जाती है. यह परंपरा करीब 200 साल पहले से चली आ रही है. बीते दो सालों से पूजा नहीं हो रही थी और इस बार फिर से पूजा करने की मांग उठी है. जनप्रतिनिधियों ने इस संबंध में मांग की है. इस पूजा में महापौर, नगर निगम आयुक्त, पार्षद और कर्मचारी मौजूद रहते हैं.

नगर निगम के पास जिम्मेदारी: बीते करीब दो दशक से नगर निगम अस्तित्व में आया है और यह जिम्मेदारी नगर निगम को सौंपी गई. पिछले 20 सालों में करीब 10 बार गड़े भेरुजी को निकालकर उनकी पूजा की गई है. पिछले छह सालों में 7 बार पूजा हो चुकी है. इसमें 2019, 2021, 2022 और 2023 में बारिश नहीं हुई थी. इन चार सालों में गड़े भेरुजी को निकालकर पूजा की गई, जबकि वर्ष 2020, 2024 और 2025 में इसकी जरूरत नहीं पड़ी.

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5 फीट नीचे हैं गड़े भेरुजी: पाटन पोल सती चबूतरा रोड पर सड़क के नीचे ही गड़े भेरुजी का स्थान है. यह सड़क से करीब 5 फीट अंदर है. नगर निगम बारिश नहीं होने पर स्थानीय लोगों की मांग पर खुदाई कर पूजा का कार्य करता है. करीब 5 फीट तक गड्ढा खोदा जाता है, फिर नीचे उतरकर भेरुजी की पूजा की जाती है. ढोल-नगाड़े और झांझ की व्यवस्था की जाती है. पंडितों द्वारा पूर्ण विधि-विधान से पूजा की जाती है.

पूजा के बाद आ जाती है बारिश: स्थानीय निवासी रिक्की टण्डन ने बताया कि पूजा के 24 घंटे के अंदर ही अधिकांश बार कोटा संभाग में भारी बारिश देखने को मिलती है. पूजा के 24 घंटे बाद मंदिर को फिर बंद कर दिया जाता है. पत्थर की लंबी पट्टी लगाकर मंदिर को कवर कर दिया जाता है. शुरुआत में सीमेंट कंक्रीट की सड़क बनाकर ढका जाता था, लेकिन इसमें समय लगता था और स्थानीय लोगों को परेशानी होती थी. यह मुख्य रास्ता होने से वाहनों की आवाजाही प्रभावित होती थी. इसलिए अब यहां इंटरलॉकिंग टाइल्स लगा दी गई हैं, ताकि जरूरत पड़ने पर आसानी से खुदाई की जा सके.

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मुहूर्त और बजट जारी होता है: महेश गौतम लल्ली ने बताया कि नगर निगम बाकायदा पूजा के लिए पंडित से मुहूर्त निकलवाता है. पूजा के लिए बजट भी जारी किया जाता है. पूरी प्रक्रिया के लिए पत्रावली चलती है. इसमें खुदाई से लेकर पूजा सामग्री, बेरिकेट, पंडित दक्षिणा और मंदिर को वापस ढकने तक का खर्च शामिल है. कुल मिलाकर करीब 10 हजार रुपये का खर्च नगर निगम उठाता है. पूजा अधिकांशतः ब्रह्म मुहूर्त में सुबह के समय होती है. मुहूर्त के समय अधिकारी, कर्मचारी, पार्षद और जनप्रतिनिधि पहुंचते हैं. पिछले वर्षों में यह पूजा सुबह 7 से 9 बजे या 11 से 12 बजे के बीच हुई है.

इस बार केवल 9 फीसदी पानी: जल संसाधन विभाग की सहायक अभियंता नीतिका पारेता ने बताया कि डैम को दो कैटेगरी में डिवाइड किया हुआ है, जिनमें 4.25 मिलियन क्यूबिक मीटर से छोटे डैम हैं. ये 32 छोटे डैम अधिकांश 20 जुलाई तक 70 से 100 फीसदी तक फुल हो जाते थे. कई डैम तो ओवरफ्लो भी हो जाया करते थे और अधिकांश में 90 फीसदी तक पानी आ जाता था, लेकिन इस बार ऐसा नहीं है. कम बारिश के चलते 31 में 50 फीसदी से कम ही पानी इनमें है. सभी डैम की क्षमता 89.98 एमसीएम है. इनमें 20 जुलाई 2025 को 53.39 एमसीएम पानी था, वहीं इस साल 20 जुलाई को 8.48 एमसीएम ही पानी बचा है.

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2025 से चार गुना कम बारिश: सहायक अभियंता पारेता के अनुसार 4.25 एमसीएम से बड़े डैम की बात की जाए तो उनमें 1479.12 एमसीएम क्षमता की जगह 583.5 ही पानी बचा है. बीते साल 2025 में अब तक में 977.32 एमसीएम पानी था, जबकि इस साल 393.83 एमसीएम पानी है. पूरे 48 डैम में 35 डैम में 50 फीसदी से कम पानी है और केवल 13 डैम में 50 फ़ीसदी से ज्यादा पानी है. बारिश की बात की जाए तो बीते साल अब तक चारों जिलों का औसत 594.54 मिलीमीटर बारिश गिर गई थी, जबकि इस साल महज 131.33 एमएम बारिश हुई है.

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