उदयपुर के हरियाली अमावस्या मेले में उमड़ा उल्लास, अजमेर में कल्पवृक्ष की पूजा
उदयपुर के हरियाली अमावस्या मेले में उमड़ा उल्लास, अजमेर में कल्पवृक्ष की पूजा मेले के दौरान फतहसागर झील से सटी पहाड़ी से चट्टान गिर गई. मलबे की चपेट में आने से 3 से 4 लोग घायल हो गए. Published : August 12, 2026 at 8:15 P…

सौजन्य से:- ETV Bharat
उदयपुर के हरियाली अमावस्या मेले में उमड़ा उल्लास, अजमेर में कल्पवृक्ष की पूजा
मेले के दौरान फतहसागर झील से सटी पहाड़ी से चट्टान गिर गई. मलबे की चपेट में आने से 3 से 4 लोग घायल हो गए.
Published : August 12, 2026 at 8:15 PM IST
उदयपुर/अजमेर: बारिश के बावजूद बुधवार को उदयपुर में हरियाली अमावस्या मेले में उल्लास देखते ही बना. 128 साल पुराने इस ऐतिहासिक मेले का आगाज सहेलियों की बाड़ी से लेकर फतहसागर पाल तक उत्सव के रंग में हुआ. छतरी और रेनकोट लेकर पहुंचे लोगों ने झूलों, दुकानों और गर्मागर्म मालपुए का जमकर आनंद लिया.स्थानीय लोगों के अनुसार बच्चों और युवाओं ने झूलों पर धूम मचाई, वहीं महिलाओं ने चूड़ियों और साज-सज्जा का सामान खरीदा. मेला 1899 में महाराणा फतह सिंह के समय शुरू हुआ था. पहले दिन पुरुष-महिला दोनों आते हैं, जबकि गुरुवार को सिर्फ महिलाओं का दिन होगा. इस बीच फतहसागर के पास पहाड़ी से चट्टान गिरने से 3-4 लोग घायल हो गए, जिन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है. राजस्थान के अजमेर सहित अन्य स्थानों पर भी हरियाली अमावस्या धूमधाम से मनाई गई. अजमेर में हरियाली अमावस्या पर अजमेर के लोहाखान और मांगलियावास में कल्पवृक्ष के पारंपरिक मेले धूमधाम से भरे.
मेले में पहुंचे स्थानीय व्यक्ति उमेश ने बताया कि इस बार भी तरह-तरह के झूले और दुकानें आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं. बच्चों और युवाओं ने झूलों का आनंद लिया, वहीं महिलाओं ने साज-सज्जा के सामान, चूड़ियां, बालों की क्लिप, घरेलू उपयोग की वस्तुओं सहित अन्य सामान की खरीदारी की. बारिश के बीच मेले में गर्मागर्म मालपुए और दूसरे पारंपरिक व्यंजनों का लोगों ने जमकर स्वाद लिया.
128 वें साल में प्रवेश कर चुका मेला: इतिहासकार हरीश ने बताया कि हरियाली अमावस्या मेले का सबसे खास पहलू सिर्फ खरीदारी नहीं, बल्कि लोगों का एक-दूसरे से मिलना-जुलना भी है. 128वें साल में प्रवेश कर चुका यह मेला आज भी मेवाड़ की लोक संस्कृति और सामाजिक मेलजोल की परंपरा को जीवित रखे हुए है. पहले दिन महिला और पुरुष दोनों मेले में शामिल होते हैं, जबकि दूसरे दिन गुरुवार को मेले में सिर्फ महिलाओं की भीड़ जुटेगी. इस दिन सखी-सहेलियां, सास-बहुएं और ननद-भोजाइयां साथ पहुंचकर मेले का आनंद लेंगी.
महाराणा फतहसिंह के समय हुई थी शुरूआत: लोकमान्यता के अनुसार हरियाली अमावस्या मेले की शुरुआत वर्ष 1899 में महाराणा फतह सिंह के समय हुई थी. अगले वर्ष चावंडी रानी ने महिलाओं के लिए विशेष मेला शुरू करवाया. शुरुआती दौर में सिटी पैलेस से हलवाइयों को सामग्री उपलब्ध कराकर मेला लगवाया जाता था और इसे मालपुए के मेले के रूप में भी जाना जाता था. समय के साथ मेला बदलता गया और आज यह पूरी तरह आत्मनिर्भर मेले के रूप में अपनी पहचान बना चुका है. बारिश ने इस बार मेले के उत्साह को और बढ़ा दिया. छतरियों और रेनकोट के साथ मेले में पहुंचे लोग बारिश के बीच घूमते, व्यंजनों का स्वाद लेते और झूलों का आनंद लेते दिखाई दिए. आधुनिक दौर में मेले का स्वरूप भले बदल गया हो, लेकिन मिलना-जुलना, पारंपरिक स्वाद और सामूहिक उत्सव का रंग आज भी इसकी सबसे बड़ी पहचान बना हुआ है.
पहाड़ी से गिरी चट्टान, 3-4 लोग घायल: इस बीच फतहसागर झील से सटी पहाड़ी से चट्टान गिर गई. पहाड़ी के मलबे की चपेट में आने से 3 से 4 लोग घायल हो गए. सुबह से ही शहर में रुक-रुक कर बारिश का दौर चल रहा है. मेले के चलते लोगों की संख्या अधिक थी, ऐसे में बड़ा हादसा हो सकता था. घायलों को अस्पताल पहुंचाया गया.
अजमेर के लोहाखान व मांगलियावास में भरे मेले: अजमेर में हरियाली अमावस्या पर अजमेर के लोहाखान और मांगलियावास में कल्पवृक्ष के पारंपरिक मेले धूमधाम से भरे. सुबह से ही नर्मदेश्वर महादेव मंदिर परिसर में 47 साल पुराने कल्पवृक्ष के जोड़े की पूजा के लिए श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगीं. मान्यता है कि समुद्र मंथन से निकले कल्पवृक्ष का जोड़ा शिव-पार्वती का प्रतीक है. महिलाएं मौली बांधकर अखंड सौभाग्य, परिवार की खुशहाली और व्यापार में उन्नति की कामना करती हैं. पुजारी दिलखुश शर्मा ने बताया कि यह परंपरा 47 साल से चली आ रही है. श्रद्धालुओं ने कहा कि यह पर्व पर्यावरण संरक्षण का भी संदेश देता है. मांगलियावास का मेला एक सदी से भी पुराना है, जहां आसपास के जिलों से लोग पहुंचे. मेले में खरीदारी और धार्मिक आयोजन के साथ उत्सव का माहौल रहा.
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