ओवैसी ने राजस्थान में तीसरी शक्ति बनाने की हुंकार भरी; बाड़मेर में RLP के प्रत्याशी ही बदलने लगे पाला
ओवैसी ने राजस्थान में तीसरी शक्ति बनाने की हुंकार भरी; बाड़मेर में RLP के प्रत्याशी ही बदलने लगे पाला ओवैसी का आह्वान हो, बेनीवाल की राजनीतिक महत्वाकांक्षा हो या राजस्थान में तीसरी ताकत खड़ी करने की कोशिश इन सबके बीच बाड…

सौजन्य से:- Hindustan
ओवैसी ने राजस्थान में तीसरी शक्ति बनाने की हुंकार भरी; बाड़मेर में RLP के प्रत्याशी ही बदलने लगे पाला
ओवैसी का आह्वान हो, बेनीवाल की राजनीतिक महत्वाकांक्षा हो या राजस्थान में तीसरी ताकत खड़ी करने की कोशिश इन सबके बीच बाड़मेर का यह घटनाक्रम आरएलपी के लिए एक बड़ा सवाल छोड़ जाता है।
राजस्थान की सियासत में तीसरी शक्ति का सपना कोई नया नहीं है। इस बार हैदराबाद से असदुद्दीन ओवैसी की आवाज भी बाड़मेर तक पहुंची। आह्वान हुआ कि हनुमान बेनीवाल को राजस्थान में तीसरी ताकत बनाया जाए। बात सुनने में दमदार है... लेकिन सियासत में सिर्फ आह्वान से ताकत नहीं बनती। उसके लिए बूथ पर खड़ा कार्यकर्ता, मैदान में डटा प्रत्याशी और आखिरी वक्त तक साथ निभाने वाला संगठन चाहिए।
और यहीं बाड़मेर में आरएलपी की कहानी कुछ ऐसी नजर आई, जैसे चुनावी मैदान में पार्टी को विपक्ष से ज्यादा अपने ही 'दिन-मान' से जूझना पड़ रहा हो।
नामांकन भरा... फिर नाम वापसी की लाइन में पहुंच गए
कहानी शुरू होती है एक प्रत्याशी धर्माराम से। पार्टी ने भरोसा जताया और उन्हें मैदान में उतारा। लेकिन चुनावी मुकाबला शुरू होने से पहले ही कहानी ने ऐसा मोड़ लिया कि धर्माराम मैदान से बाहर होने के रास्ते पर चल पड़े।
नाम वापसी का दिन आया तो धर्माराम खुद नामांकन वापस लेने पहुंच गए। पार्टी के पदाधिकारियों ने रोकने-समझाने की कोशिश की, लेकिन जब कोई जाने पर आमादा हो जाए तो संगठन की पकड़ भी कितनी देर तक रोक सकती है?
आखिरकार प्रत्याशी ने नाम वापस ले लिया और आरएलपी के लिए चुनावी गणित का एक मोर्चा मतदान से पहले ही कमजोर पड़ गया।
फिर बाजार में बदला ‘पटका’
कहानी यहां खत्म होती तो भी गनीमत थी। इसके बाद एक भाजपा प्रत्याशी के प्रचार के दौरान आरएलपी प्रत्याशी आचार्यजी की मुलाकात भाजपा के वरिष्ठ नेताओं से हो गई।
सियासत में कभी-कभी मुलाकात छोटी होती है, लेकिन उसका असर लंबा।
बताया गया कि भरे बाजार आचार्यजी ने आरएलपी का पटका उतारा और भाजपा का दुपट्टा गले में डाल लिया। यानी जिस मैदान में मुकाबला करने उतरे थे, वहीं अचानक पाला बदलने का दृश्य सामने आ गया।
आरएलपी के लिए यह तस्वीर किसी चुनावी पोस्टर से कम नहीं थी—बस फर्क इतना था कि पोस्टर पार्टी के पक्ष में नहीं, बल्कि उसकी मुश्किलें दिखा रहा था।
ट्रैक्टर पर निकला प्रचार, सड़क के गड्ढे ने बिगाड़ा खेल
अब आते हैं उस वाकये पर जिसने चुनावी प्रचार को अचानक अफरा-तफरी में बदल दिया।
आरएलपी के एक स्थानीय नेता एक प्रत्याशी के समर्थन में ट्रैक्टर लेकर प्रचार में निकले। ट्रैक्टर पर पोस्टर-बैनर लगे थे। आसपास कार्यकर्ता नारे लगाते हुए चल रहे थे। माहौल पूरी तरह चुनावी था।
लेकिन रास्ते में सड़क का एक गड्ढा पड़ा और प्रचार का ट्रैक्टर बेकाबू हो गया। इसी दौरान पार्टी की दो महिला कार्यकर्ता उसकी चपेट में आकर घायल हो गईं।
एक पल पहले जहां नारे गूंज रहे थे, वहां अचानक चीख-पुकार मच गई। पदाधिकारियों के हाथ-पैर फूल गए। घायल महिलाओं को अस्पताल पहुंचाया गया।
इसके बाद दूसरे दलों के नेताओं ने आरोप लगाते हुए माहौल को और गरमा दिया। आरोप लगाया गया कि ट्रैक्टर चालक नशे में था। हालांकि ऐसे आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है।
खारा जी ने शायद गड्ढों को पहले ही पढ़ लिया था!
इधर, भाजपा की जिला राजनीति में सक्रिय खारा जी को शायद बाड़मेर की सड़कों की हकीकत पहले से मालूम थी। इसलिए उन्होंने प्रचार के लिए ट्रैक्टर से दूरी बनाए रखना ही बेहतर समझा।
कहते हैं राजनीति में समय और रास्ता दोनों पहचानना जरूरी है। खारा जी ने शायद दोनों पहचान लिए। बड़े वाहन के बजाय अपनी 'फटफटिया' संभाली और गली-गली घूमकर प्रचार में जुटे रहे।
तीसरी शक्ति का सपना... लेकिन बूथ तक ताकत कैसे पहुंचेगी?
ओवैसी का आह्वान हो, बेनीवाल की राजनीतिक महत्वाकांक्षा हो या राजस्थान में तीसरी ताकत खड़ी करने की कोशिश—इन सबके बीच बाड़मेर का यह घटनाक्रम आरएलपी के लिए एक बड़ा सवाल छोड़ जाता है।
सवाल यह नहीं कि तीसरी शक्ति बनेगी या नहीं। सवाल यह है कि तीसरी शक्ति बनने के लिए जिस मजबूत संगठन की जरूरत है, वह जमीन पर कितना मजबूत है?
क्योंकि चुनाव सिर्फ भाषणों और नारों से नहीं जीते जाते। चुनाव उस कार्यकर्ता से जीते जाते हैं जो आखिरी घंटे तक झंडा थामे खड़ा रहे, उस प्रत्याशी से जीते जाते हैं जो नामांकन से मतदान तक मैदान में डटा रहे और उस संगठन से जीते जाते हैं जो अपने लोगों को एकजुट रख सके।
बाड़मेर में फिलहाल आरएलपी की कहानी में यही पन्ना सबसे ज्यादा दिलचस्प है—तीसरी शक्ति बनने का सपना बड़ा है, लेकिन अपने ही घर के 'दिन-मान' कुछ ठीक नजर नहीं आ रहे।
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