राजस्थान में ओवैसी की एंट्री: निकाय चुनावों में क्या बदलाव कर सकती है?
एआईएमआईएम की एंट्री को समझने के लिए राजस्थान के जनसांख्यिकीय आंकड़ों और वोट बैंक के गणित को समझना जरूरी है। राज्य में लगभग 9.07 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है, जिनकी संख्या करीब 62 लाख से अधिक है। ओवैसी की पार्टी अपने आधिकारिक चुनाव चिह्न के साथ-साथ समर्थित निर्दलीय उम्मीदवारों को भी मैदान में उतारने की रणनीति बना रही है। यह चुनाव में वोटों के विभाजन से स्थानीय स्तर पर कई सीटों के नतीजे प्रभावित कर सकता है।

सौजन्य से:- Navbharat Times
पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष जमील खान के प्रस्ताव पर एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने हरी झंडी दे दी है। पार्टी अपने आधिकारिक चुनाव चिह्न के साथ-साथ समर्थित निर्दलीय उम्मीदवारों को भी मैदान में उतारने की रणनीति बना रही है।
राजस्थान में मुस्लिम वोट बैंक: कहां और कितना है प्रभाव?
ओवैसी की इस एंट्री को समझने के लिए राजस्थान के जनसांख्यिकीय आंकड़ों और वोट बैंक के गणित को जानना बेहद जरूरी है। संभावित आंकड़ों के अनुसार राजस्थान में मुस्लिम आबादी लगभग 9.07 प्रतिशत है, जिनकी संख्या करीब 62 लाख से अधिक है।- जैसलमेर: राज्य में सबसे ज्यादा लगभग 25.1% मुस्लिम आबादी।
- मेवात क्षेत्र (अलवर व भरतपुर): अलवर में 14.9% और भरतपुर में 14.57% आबादी।
- नागौर व कोटा: नागौर में 13.74% और कोटा में 12.51%।
- शेखावाटी (सीकर व चूरू): दोनों जिलों में लगभग 12.24% मुस्लिम जनसंख्या।
- अन्य प्रमुख क्षेत्र: बाड़मेर (12.34%), अजमेर (12.16%), जोधपुर (11.16%), टोंक (10.77%) और राजधानी जयपुर (10.37%)।
क्या बिगड़ेगा बीजेपी और कांग्रेस का सियासी खेल?
पारंपरिक रूप से राज्य में मुस्लिम मतदाता बड़े पैमाने पर कांग्रेस का समर्थक माना जाता रहा है। हालांकि, पंचायत और नगर निकाय जैसे स्थानीय स्तर के चुनावों में व्यक्तिगत प्रभाव, स्थानीय मुद्दे और जातीय समीकरण भी बड़ी भूमिका निभाते हैं।- कांग्रेस के लिए चुनौती: यदि ओवैसी की पार्टी जयपुर के परकोटे, मेवात, शेखावाटी और सीमावर्ती जिलों में अपने उम्मीदवार मजबूती से उतारती है, तो इससे कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लग सकती है। वोटों के विभाजन से स्थानीय स्तर पर कई सीटों के नतीजे प्रभावित हो सकते हैं।
- बीजेपी के लिए अवसर व रणनीति: बहुकोणीय मुकाबले (Multi-cornered contest) की स्थिति में मतों का विभाजन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बीजेपी के चुनावी गणित को आसान बना सकता है, हालांकि स्थानीय निकाय चुनावों में निर्दलीय भी मजबूत उम्मीदवार बनकर उभरते हैं।
ओवैसी की यह पहल भले ही स्थानीय निकायों से शुरू हो रही हो, लेकिन यदि एआईएमआईएम बूथ स्तर पर मजबूत संगठन खड़ा करने में सफल रहती है, तो यह राजस्थान के आगामी राजनीतिक परिदृश्य में एक नया मोड़ ला सकती है।
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