होमपर्यटनहरियाली अमावस्या: सवा सौ साल से कायम अनूठी परंपरा, ‘सखियों के मेले’ में पुरुषों की नो एंट्री - udaipur hariyali amavasya mela womenonly day tradition
पर्यटन

हरियाली अमावस्या: सवा सौ साल से कायम अनूठी परंपरा, ‘सखियों के मेले’ में पुरुषों की नो एंट्री - udaipur hariyali amavasya mela womenonly day tradition

हरियाली अमावस्या: सवा सौ साल से कायम अनूठी परंपरा, ‘सखियों के मेले’ में पुरुषों की नो एंट्री उदयपुर का हरियाली अमावस्या मेला अपनी 125 साल पुरानी अनूठी परंपरा के लिए प्रसिद्ध है, जहाँ दूसरे दिन केवल महिलाओं को प्रवेश मिलत…

Jagran के अनुसार12 अगस्त 2026 को 02:16 pm बजे
हरियाली अमावस्या: सवा सौ साल से कायम अनूठी परंपरा, ‘सखियों के मेले’ में पुरुषों की नो एंट्री

 - udaipur hariyali amavasya mela womenonly day tradition

सौजन्य से:- Jagran

हरियाली अमावस्या: सवा सौ साल से कायम अनूठी परंपरा, ‘सखियों के मेले’ में पुरुषों की नो एंट्री

उदयपुर का हरियाली अमावस्या मेला अपनी 125 साल पुरानी अनूठी परंपरा के लिए प्रसिद्ध है, जहाँ दूसरे दिन केवल महिलाओं को प्रवेश मिलता है। ...और पढ़ें

HighLights

- उदयपुर का हरियाली अमावस्या मेला 125 साल पुरानी परंपरा।

- मेले का दूसरा दिन केवल महिलाओं के लिए आरक्षित।

- महारानी चावड़ी की इच्छा से हुई थी यह शुरुआत।

जागरण संवाददाता, उदयपुर। झीलों की नगरी उदयपुर की पहचान सिर्फ झीलों और महलों से नहीं, बल्कि उन परंपराओं से भी है, जो एक सदी से अधिक समय बाद आज भी जीवंत हैं। हरियाली अमावस्या का मेला ऐसी ही मेवाड़ी विरासत है।

सावन की हरियाली, फतहसागर की पाल और सहेलियों की बाड़ी के बीच लगने वाला यह मेला पहले दिन सभी के लिए खुला रहता है, लेकिन दूसरे दिन पूरा मेला महिलाओं के नाम हो जाता है। पुरुषों के प्रवेश पर रोक और महिलाओं के लिए विशेष दिन की यह परंपरा इसे देश के अनूठे मेलों में अलग पहचान देती है।

1898-99 से जुड़ा इतिहास, महारानी की इच्छा से बनी परंपरा

हरियाली अमावस्या मेले की शुरुआत को लेकर इतिहास में 1898 और 1899 दोनों वर्षों का उल्लेख मिलता है। प्रचलित मान्यता के अनुसार महाराणा फतह सिंह के समय फतहसागर झील के लबालब भरने की खुशी में मेले की शुरुआत हुई।

कहा जाता है कि महाराणा अपनी महारानी चावड़ी के साथ झील पर पहुंचे थे। महारानी की इच्छा पर मेले का दूसरा दिन महिलाओं के लिए निर्धारित किया गया, जो आगे चलकर ‘सखियों का मेला’ कहलाया।

पहले दिन रौनक, दूसरे दिन सिर्फ सखियों का संसार

पहले दिन फतहसागर की पाल और सहेलियों की बाड़ी के आसपास झूले, दुकानें, खान-पान और पारंपरिक वस्तुओं के स्टॉल सजते हैं। दूसरे दिन नजारा पूरी तरह बदल जाता है। पारंपरिक परिधानों में सजी महिलाएं सहेलियों के साथ मेले में पहुंचती हैं। खरीदारी, झूले, खान-पान और आपसी मेल-मिलाप इस दिन को महिलाओं के विशेष उत्सव में बदल देते हैं।

खबरें और भी

सिर्फ मेला नहीं, महिलाओं को मिला अपना सामाजिक स्पेस

इस परंपरा की सबसे बड़ी खासियत केवल पुरुषों की ‘नो एंट्री’ नहीं है। यह उस दौर की सामाजिक सोच का भी उदाहरण है, जब महिलाओं के लिए सार्वजनिक आयोजनों में स्वतंत्र स्थान की कल्पना सहज नहीं थी। मेवाड़ में महिलाओं के लिए मेले का पूरा दिन निर्धारित होना आज भी महिला सामाजिक सहभागिता की ऐतिहासिक मिसाल माना जा सकता है।

उदयपुर की पहचान बन चुका आयोजन

हरियाली अमावस्या मेला अब सिर्फ मनोरंजन का अवसर नहीं, बल्कि मेवाड़ की लोक संस्कृति, सावन की परंपरा और रियासतकालीन विरासत का जीवंत दस्तावेज है।

राजस्थान पर्यटन के अनुसार, मेले में 4 से 5 लाख तक मेलार्थियों के पहुंचने का अनुमान है। यही भीड़ और दूसरे दिन महिलाओं की विशिष्ट भागीदारी इसे उदयपुर के सबसे खास सांस्कृतिक आयोजनों में शामिल करती है।

Powered by Reporting Rajasthan Files

संबंधित ख़बरें